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खामोश चीख : सुसाइट के पहले प्रियांशु ने लिखा, भगवान किसी को ऐसे पिता न दे!

25 साल की एक चुप्पी की कीमत प्रियांशु की कहानी हर घर के लिए चेतावनी : कानपुर के 25 वर्षीय प्रियांशु श्रीवास्तव की आत्महत्या कोई साधारण खबर नहीं है। यह एक ऐसी खामोश चीख है, जो हर उस घर तक पहुंचनी चाहिए जहां अनुशासन के नाम पर डर, और प्यार की जगह नियंत्रण ने ले ली है। अपने सुसाइड नोट में प्रियांशु ने जो लिखा कि भगवान किसी को ऐसे पिता न दे, वह एक वाक्य नहीं, उस लंबे मानसिक संघर्ष का प्रमाण है जिसे शायद वह वर्षों से अकेले झेल रहा था।

कीर्तिमान ब्यूरो
कीर्तिमान ब्यूरो
24 Apr 2026, 07:06 PM
📍 नई दिल्ली

जब घर ही सुरक्षित जगह न रहे

हर बच्चा अपने घर को एक सुरक्षित ठिकाने के रूप में देखना चाहता है। लेकिन जब वही घर बार-बार डांट, अपमान, डर और सजा का केंद्र बन जाए, तो उसका मन हमेशा ‘खतरे’ में रहने लगता है। शरीर में तनाव हार्मोन (कोर्टिसोल) लगातार बढ़ा रहता है और दिमाग का वह हिस्सा प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स जो निर्णय लेने, भावनाओं को समझने और संतुलित प्रतिक्रिया देने में मदद करता है, धीरे-धीरे प्रभावित होने लगता है। ऐसे बच्चे जीते तो हैं, लेकिन ‘सर्वाइवल मोड’ में जहां हर प्रतिक्रिया डर से संचालित होती है, न कि समझ से।

मुझमें ही कमी है एक खतरनाक भ्रम

जब एक बच्चे को बार-बार यह महसूस कराया जाता है कि वह पर्याप्त नहीं है, तो वह इस झूठ को सच मान लेता है। वह खुद को कमतर आंकने लगता है, अपने अस्तित्व पर ही सवाल उठाने लगता है। यही भावना आगे चलकर आत्म-संदेह और आत्म-घृणा में बदल जाती है।

आत्मविश्वास नहीं, सिर्फ डर पनपता है

बहुत सख्त और भावनात्मक रूप से दूर माता-पिता के माहौल में पलने वाले बच्चों का आत्मसम्मान कमजोर रह जाता है। वे हर समय खुद को साबित करने की कोशिश करते हैं, लेकिन भीतर से खाली महसूस करते हैं। उन्हें लगता है कि वे प्यार और भरोसे के लायक नहीं हैं।

अंदर ही अंदर घिरती उदासी

ऐसे बच्चों में कुछ संकेत साफ दिखते हैं अकेलापन, अचानक गुस्सा, लोगों को खुश करने की अति कोशिश, या छोटी असफलताओं पर भी टूट जाना। यह केवल व्यवहार नहीं, बल्कि भीतर चल रही एक गहरी लड़ाई के संकेत होते हैं।

कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा : जो दिखता नहीं, लेकिन रहता हमेशा है। बार-बार की भावनात्मक चोट कॉम्प्लेक्स ट्रॉमा बन जाती है। यह व्यक्ति के सोचने, महसूस करने और रिश्तों को निभाने के तरीके को लंबे समय तक प्रभावित करता है। उसे विश्वास करना मुश्किल लगता है। खुद पर भी और दूसरों पर भी।

क्या किया जा सकता है? उम्मीद अब भी है

सबसे महत्वपूर्ण बात इसका इलाज संभव है। थेरेपी, खासकर ट्रॉमा-केंद्रित काउंसलिंग, व्यक्ति को अपने अतीत को समझने और उससे बाहर आने में मदद करती है। लेकिन पहला कदम है समस्या को स्वीकार करना।

माता-पिता के लिए चेतावनी संकेत

अगर आपके बच्चे में ये बदलाव दिखें, तो सतर्क हो जाइए—

  • पढ़ाई या पसंदीदा चीजों में रुचि कम होना
  • दोस्तों और परिवार से दूरी बनाना
  • नींद या भूख में बदलाव
  • बार-बार बिना वजह शारीरिक शिकायतें
  • उदासी, चिड़चिड़ापन या असहजता
  • घर आने से डरना

गंभीर संकेत:

  • अपनी प्रिय चीजें दूसरों को देना
  • खुद को बोझ मानना
  • निराशा या हार मानने जैसी बातें करना

इन्हें “उम्र का असर” या “फेज” कहकर नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है।

पेरेंटिंग का असली मतलब : डर नहीं, भरोसा

अनुशासन जरूरी है, लेकिन सजा नहीं। फर्क समझना होगा।
तुम बेकार हो” कहने से बच्चा नहीं सुधरता, बल्कि टूटता है।
तुम्हारे इस व्यवहार से मुझे दुख हुआ” यह संवाद बनाता है।

रोज 10 मिनट का समय बिना फोन, बिना जजमेंट बच्चे के साथ बिताना, उसके मानसिक स्वास्थ्य की सबसे मजबूत नींव हो सकता है।

एक सवाल, जो हर माता-पिता को खुद से पूछना चाहिए

क्या आपका बच्चा आपसे डरता है, या आप पर भरोसा करता है?

दोनों स्थितियों में वह आपकी बात मान सकता है, लेकिन उसका मानसिक स्वास्थ्य केवल भरोसे पर ही टिकता है।

आप अपने बच्चे को सबसे बड़ा उपहार महंगी शिक्षा या सुविधाएं नहीं दे सकते। सबसे बड़ा उपहार है यह विश्वास कि “तुम जैसे हो, वैसे ही पर्याप्त हो।”

प्रियांशु की कहानी खत्म हो गई, लेकिन उसकी पीड़ा हमें एक जिम्मेदारी देकर गई हैअपने बच्चों को सुनें, समझें और उन्हें वह सुरक्षित दुनिया दें, जिसके वे हकदार हैं।

 

(जनहित में : यह पूरी जानकारी NBT ने प्रकाशित और प्रसारित की है, जिसमें देश की ख्यात नाम मनोवैज्ञानिक नंदिनी दुबे ने लिखा है कि यह घटना हमें एक कठोर सच्चाई के सामने खड़ा करती है। बच्चे टूटते अचानक नहीं हैंवे धीरे-धीरे भीतर से बिखरते हैं। प्रख्यात मनोवैज्ञानिक नंदिनी दुबे एवं NBT को साभार के साथ)

 

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