एक तरफ देश और राज्य में 'हर घर जल' और 'नल-जल योजना' के तहत करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए जा रहे हैं, वहीं मध्य प्रदेश के नवगठित जिले मऊगंज से एक ऐसी हृदयविदारक जमीनी हकीकत सामने आई है, जिसने विकास के तमाम दावों की पोल खोल कर रख दी है। यहाँ प्यास, इंसानी रिश्तों पर इस कदर भारी पड़ रही है कि पानी की किल्लत अब हँसते-खेलते परिवारों को उजाड़ रही है।
मामला हनुमना विकासखंड के कोढ़वा गांव का है, जहाँ जल संकट इस कदर गहरा गया है कि तंग आकर बहुएं अपने ससुराल को छोड़ मायके पलायन करने पर मजबूर हो गई हैं।
सुबह 4 बजे से 'पानी की अग्निपरीक्षा'
लगभग 200 परिवारों की आबादी वाले कोढ़वा गांव की सुबह किसी सामान्य गांव की तरह नहीं होती। यहाँ सुबह के 4 बजते ही महिलाओं और मासूम बच्चों के हाथों में बाल्टियाँ और डिब्बे सज जाते हैं। पथरीला इलाका होने के कारण यहाँ का भूजल स्तर (Water Table) पाताल में जा चुका है।
ग्रामीणों के मुताबिक, पूरे 2 किलोमीटर के दायरे में महज एक सरकारी चालू नल है। वहाँ भी पानी का प्रेशर इतना कम है कि सिर्फ एक बाल्टी पानी भरने के लिए महिलाओं को घंटों लाइन में लगकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है।
"यह समस्या आज की नहीं है, पिछले 10 सालों से हम नरकीय जीवन जी रहे हैं। चुनाव आते हैं, नेता आते हैं, वादे करते हैं और चले जाते हैं। हमारे 200 परिवारों की सुध लेने वाला आज तक कोई नहीं आया।" — लल्लू यादव, स्थानीय निवासी
स्कूल छूटे, तालाब का पानी जहरीला
गांव की इस त्रासदी का सबसे बुरा असर महिलाओं के स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य पर पड़ रहा है:
बीमारियों का घर: महिलाएं करीब 1.5 से 2 किलोमीटर दूर 'गदाखुर स्कूल' के पास स्थित एकमात्र नल से पानी लाने को मजबूर हैं। सिर और कमर पर भारी बर्तन उठाने के कारण गांव की अधिकांश महिलाएं गंभीर शारीरिक और रीढ़ की समस्याओं (Spinal issues) से जूझ रही हैं।
बचपन पर ग्रहण: पानी के इस संकट ने बच्चों को स्कूल से दूर कर दिया है। सुबह पढ़ाई करने के बजाय बच्चे अपनी माताओं के साथ पानी ढोने में मदद करते हैं।
जहरीला हो चुका है तालाब: गांव का इकलौता तालाब अब सिर्फ कागजों या नाम का रह गया है। उसका पानी इतना दूषित और जहरीला हो चुका है कि वह इंसानों को छोड़िए, मवेशियों (जानवरों) के पीने लायक भी नहीं बचा है।
प्रशासनिक दावों को ठेंगा दिखाती हकीकत
एक तरफ जहां जिला प्रशासन और कागजी आंकड़े दावा करते हैं कि 'जल जीवन मिशन' के तहत हर घर तक पानी पहुँच रहा है, वहीं कोढ़वा गांव इन दावों के खोखलेपन को चीख-चीख कर बयां कर रहा है।
ताजा स्थिति
वर्तमान में स्थिति और भी भयावह हो चुकी है। अगर प्रशासन ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तुरंत टैंकरों की व्यवस्था नहीं की या नए बोरवेल नहीं खुदवाए, तो वह दिन दूर नहीं जब यह पूरा गांव 'भूतिया गांव' (Ghost Village) में तब्दील हो जाएगा। ग्रामीण अब इस उम्मीद में हैं कि शायद नवगठित जिले के आला अधिकारी और सूबे के मुखिया इस मानवीय संकट का संज्ञान लेंगे और इस गांव को उजड़ने से बचाएंगे।

