बिहार की राजनीति में ऐसे क्षण विरले ही आते हैं, जब घटनाएं सरकार के गठन या पतन तक सीमित नहीं रहतीं, वह पूरे राजनीतिक ढांचे को पुनर्परिभाषित कर देती हैं। आज का दिन उसी श्रेणी में आता है। यह एक मुख्यमंत्री के इस्तीफे या नए चेहरे के चयन की कहानी नहीं है, उस लंबे दौर के समापन का संकेत है, जिसमें एक व्यक्ति और एक दल ने सत्ता की धुरी को अपने इर्द-गिर्द बनाए रखा। नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर दिल्ली की राजनीति की ओर बढ़ना एक व्यक्तिगत निर्णय भर नहीं है। यह उस संतुलनकारी राजनीति के मॉडल का निर्णायक दिन है, जिसने दो दशकों तक बिहार की सियासत को त्रिकोणीय बनाए रखा।
सियासी स्वरूप
बिहार आज
जिस मोड़ पर खड़ा है,
वह सिर्फ सत्ता परिवर्तन का क्षण नहीं है। यह
उस राजनीति के अंत का संकेत है, जिसमें संतुलन, समझौता और रणनीतिक लचीलापन प्रमुख तत्व थे। अब जो राजनीति उभर रही है,
वह अधिक स्पष्ट, अधिक आक्रामक और अधिक
ध्रुवीकृत होगी। नीतीश कुमार के हटने से जो खाली स्थान बना है, वह एक नेता का नहीं, एक पूरी राजनीतिक शैली का
खालीपन है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या नई व्यवस्था स्थिरता ला पाती है या
फिर राजनीतिक टकराव और गहरा होता है। लेकिन इतना तय है कि बिहार की सियासत अब पहले
जैसी नहीं रहेगी। यह एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां
मुकाबला सीधा होगा और परिणाम भी अधिक निर्णायक।
बीस साल की राजनीति
बिहार की राजनीति को समझने के लिए पिछले बीस साल को समझना जरूरी है। यह वह दौर था, जब सत्ता का गणित सीटों या वोट प्रतिशत से तय नहीं होता था, गठबंधनों की लचक और नेतृत्व की रणनीतिक क्षमता से संचालित होता था। नीतीश कुमार ने इसी लचीलापन को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया। उन्होंने समय के अनुसार अपने राजनीतिक साझेदार बदले, लेकिन सत्ता की चाबी हमेशा अपने पास रखी। यही कारण था कि कभी भाजपा उनके साथ रही, कभी राजद के साथ समीकरण बने और हर बार सत्ता का केंद्र वही बने रहे। यह एक प्रकार की संतुलनकारी राजनीति थी, जिसमें कोई भी दल पूरी तरह प्रभुत्व स्थापित नहीं कर पाया। अब जब यह केंद्र हट रहा है, तो स्वाभाविक है कि राजनीति का स्वरूप भी बदल जाएगा। त्रिकोणीय संघर्ष धीरे-धीरे द्विध्रुवीय टकराव में बदलने की दिशा में बढ़ रहा है।
सहयोगी से
नियंत्रक बनने की यात्रा
इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभ उस दल को मिल रहा है, जो अब तक सत्ता में रहते हुए भी पीछे की सीट पर बैठा था। अब पहली बार वह स्थिति बन रही है, जब सत्ता की स्टेरिंग पूरी तरह उसके हाथ में होगी। यह परिवर्तन पद का नहीं, राजनीतिक व्यवहार का भी है। अब तक जो निर्णय साझेदारी के आधार पर लिए जाते थे, वे अब एकतरफा दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। इससे नीतियों की प्राथमिकता, प्रशासनिक निर्णय और राजनीतिक संदेश तीनों बदलेंगे। यह बदलाव बिहार की राजनीति को अधिक केंद्रीकृत और आक्रामक बना सकता है। बिहार की राजनीति अब गठबंधन या समीकरण का खेल नहीं रह जाएगी। यह वैचारिक टकराव की ओर बढ़ रही है। एक तरफ विकास, राष्ट्रीय नेतृत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एजेंडा होगा। दूसरी तरफ सामाजिक न्याय, आरक्षण और जातीय संतुलन की राजनीति। यह टकराव अधिक स्पष्ट और तीखा होगा, क्योंकि अब बीच का संतुलनकारी तत्व कमजोर हो चुका है।
नेतृत्व
से संगठन तक की चुनौती
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गहरा प्रभाव जेडीयू पर पड़ने की संभावना है। अब तक इस दल की पहचान उसके नेतृत्व से जुड़ी रही। संगठनात्मक मजबूती सीमित रही और वोट बैंक भी बड़े पैमाने पर नेतृत्व आधारित रहा। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह दल अपने दम पर खड़ा रह पाएगा? या फिर उसके सामाजिक आधार पर अन्य दलों की नजर टिकेगी। विशेष रूप से कुर्मी, कोइरी और अति पिछड़ा वर्ग का समीकरण अब खुला मैदान बन चुका है। यह वही वर्ग है, जिसने वर्षों तक सत्ता संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाई। अब यह वर्ग किस ओर झुकता है, यह आने वाली राजनीति तय करेगा।
तेजस्वी
के सामने अवसर और परीक्षा दोनों
नीतीश कुमार के हटने से विपक्ष के भीतर नेतृत्व की अस्पष्टता समाप्त हो गई है। अब विपक्ष के पास एक स्पष्ट चेहरा है, लेकिन इसके साथ ही जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। अब तक विपक्ष की रणनीति अक्सर गठबंधन की मजबूरियों से प्रभावित रहती थी। अब स्थिति अलग है। तेजस्वी यादव के सामने अब सीधी चुनौती है। सत्ता पक्ष के मजबूत संगठन का मुकाबला, युवा और बेरोजगारी के मुद्दे को धार देना और जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय को राजनीतिक एजेंडा बनाना। यह अवसर भी है और परीक्षा भी। क्योंकि अब किसी तीसरे विकल्प की गुंजाइश कम होती जा रही है।
