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एम्स हॉस्पिटल  रायपुर
एम्स हॉस्पिटल रायपुर
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बेड का संकट : रायपुर एम्स में गंभीर मरीजों को भी नहीं मिल रही जगह, रेफर के भरोसे इलाज

AIIMS Raipur में मरीजों की संख्या लगातार बढ़ने के कारण स्वास्थ्य व्यवस्था पर भारी दबाव है। रोज़ हजारों मरीज OPD और इमरजेंसी में पहुंच रहे हैं, जबकि 1000 बेड क्षमता कम पड़ रही है। नतीजतन कई गंभीर मरीजों को भी बेड न मिलने पर अन्य अस्पतालों जैसे Dr. Bhimrao Ambedkar Memorial Hospital में रेफर किया जा रहा है। इमरजेंसी में आने वाले मरीजों को घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार समय पर इलाज न मिलने से स्थिति गंभीर हो जाती है। MRI, CT स्कैन जैसी जांचों के लिए लंबी कतारें और रिपोर्ट में देरी भी इलाज को प्रभावित कर रही हैं, जिससे मरीजों को निजी लैब का सहारा लेना पड़ रहा है और खर्च बढ़ रहा है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 02 May 2026, 10:40 AM · अपडेट: 03 Oct 2026, 03:01 PM
रायपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

छत्तीसगढ़ के सबसे प्रतिष्ठित चिकित्सा संस्थान, अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) रायपुर में इन दिनों स्वास्थ्य व्यवस्थाएं चरमराती नजर आ रही हैं। यहाँ आने वाले मरीजों को इलाज मिलना तो दूर, एक बेड हासिल करने के लिए भी भारी जद्दोजहद करनी पड़ रही है। आलम यह है कि अस्पताल में क्षमता से अधिक दबाव होने के कारण प्रबंधन अब गंभीर मरीजों को भी हाथ लगाने से बच रहा है और उन्हें 'रेफर पर्ची' थमाकर अन्य अस्पतालों की ओर रवाना किया जा रहा है।

हर दिन 20 से ज्यादा मरीज हो रहे रेफर

एम्स की ओपीडी में रोजाना 3 से 4 हजार मरीज पहुँच रहे हैं, जबकि इमरजेंसी में आने वाले मरीजों की संख्या भी 150 से 200 के पार रहती है। 1000 बिस्तरों वाले इस अस्पताल में जगह की भारी कमी के कारण हर दिन लगभग 15 से 20 मरीजों को आंबेडकर अस्पताल (मेकाहारा) या डीकेएस (DKS) अस्पताल रेफर किया जा रहा है। इनमें से कई मरीज ऐसे होते हैं जिनकी हालत बेहद नाजुक होती है, लेकिन बिस्तर खाली न होने के कारण उनके पास शहर के चक्कर काटने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

गंभीर बीमारियों में भी राहत नहीं

हैरानी की बात यह है कि ब्रेन हेमरेज, छाती में गंभीर संक्रमण, लिवर की खराबी, हाई ब्लड प्रेशर और अनियंत्रित शुगर जैसी जानलेवा स्थितियों वाले मरीजों को भी बेड नहीं मिल पा रहे हैं। एम्बुलेंस में घंटों इंतजार करने के बाद जब जवाब मिलता है कि 'जगह नहीं है', तो परिजनों के पास सरकारी या महंगे निजी अस्पतालों की ओर भागने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता। 3 से 5 घंटे का यह इंतजार कई बार मरीजों की जान पर भी भारी पड़ रहा है।

जांच के लिए लंबी कतारें और निजी लैब की लूट

अस्पताल के भीतर केवल बेड का ही संकट नहीं है, बल्कि जांच सेवाओं का हाल भी बेहाल है। ओपीडी में पर्ची कटाने से लेकर एमआरआई (MRI), सीटी स्कैन, सोनोग्राफी और एक्स-रे जैसी जरूरी जांचों के लिए मरीजों को लंबी लाइनों में खड़ा होना पड़ रहा है।

अस्पताल की मशीनों पर भारी दबाव के कारण रिपोर्ट मिलने में भी काफी देरी हो रही है। इस देरी से बचने और जल्द इलाज शुरू कराने के चक्कर में मजबूर मरीज निजी लैब का सहारा ले रहे हैं। मुफ्त या कम दर पर होने वाला इलाज अब निजी लैब और निजी अस्पतालों की वजह से आम आदमी की जेब पर भारी पड़ रहा है।

बढ़ता बोझ और सीमित संसाधन

विशेषज्ञों का मानना है कि मरीजों की बढ़ती संख्या के अनुपात में अस्पताल में संसाधनों और बिस्तरों का विस्तार नहीं हुआ है। एम्स जैसे संस्थान पर बढ़ते इस बोझ ने पूरी व्यवस्था को प्रभावित किया है, जिसका सीधा खामियाजा प्रदेश के उन गरीब मरीजों को भुगतना पड़ रहा है जो उम्मीद लेकर दूर-दराज के इलाकों से यहाँ पहुँचते हैं। फिलहाल, एम्स रायपुर में 'इलाज की आस' अब 'रेफर के डर' में तब्दील होती दिख रही है।

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