पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले का छोटा-सा शहर जियागंज… पहली नज़र में बिल्कुल साधारण। न चमक, न भीड़, न किसी बड़े सितारे की मौजूदगी का अहसास। लेकिन जैसे ही आप इन गलियों में ठहरकर सुनते हैं, तो एक अनसुना संगीत आपके भीतर उतरने लगता है। ये वही शहर है, जिसने अरजीत सिंग को गढ़ा है।
यहां के
लोग उन्हें ‘अरिजीत सिंह’ नहीं,
बल्कि ‘सोमू’ के नाम से जानते हैं, एक ऐसा नाम,
जिसमें अपनापन है, नजदीकी है और कोई स्टारडम
नहीं। हैरानी की बात यह है कि इस पूरे शहर में आपको ‘सोमू’ का एक भी बड़ा पोस्टर
या बैनर नहीं दिखेगा। न कोई होर्डिंग, न कोई प्रचार फिर भी
हर दिल में वही बसते हैं।
मुंबई की
चकाचौंध भरी दुनिया में जहां नाम और शोहरत अक्सर शोर के साथ चलते हैं, वहीं अरिजीत ने हमेशा खुद को इस
नुमाइश से दूर रखा। यही वजह है कि जब जनवरी में उन्होंने अचानक प्लेबैक सिंगिंग से
दूरी बनाने का फैसला लिया, तो यह सिर्फ एक करियर मूव नहीं,
बल्कि एक गहरी सोच का संकेत था। उनके गाए गीत “फिर ले आया दिल…”जैसे सचमुच उन्हें वापस जियागंज की उन्हीं गलियों
में ले आए, जहां से उनका सफर शुरू हुआ था।
जियागंज
में उनके प्रभाव को समझना हो तो किसी मंच या समारोह में नहीं, बल्कि आम लोगों के बीच जाना होगा।
यहां के युवा उनके गानों की नकल नहीं करते, बल्कि उनके
स्वभाव को अपनाने की कोशिश करते हैं। सादगी, जमीन से जुड़ाव
और अपनी जड़ों के प्रति सम्मान ये वो चीजें हैं, जो ‘सोमू’
ने यहां की नई पीढ़ी को दी हैं।
स्थानीय
लोगों का कहना है कि अरिजीत अक्सर चुपचाप शहर आते हैं, अपने पुराने दोस्तों से मिलते हैं और
बिना किसी शोर-शराबे के वापस लौट जाते हैं। यही सादगी उन्हें दूसरों से अलग बनाती
है। यही वजह है कि यहां उनके नाम का कोई प्रदर्शन नहीं, बल्कि
एक गहरा सम्मान है।
जियागंज
की गलियां बताती हैं कि असली स्टारडम वह नहीं, जो दीवारों पर दिखे बल्कि वह है, जो
दिलों में बस जाए। और ‘सोमू’ ने यह मुकाम बिना शोर, बिना
प्रचार और बिना किसी दिखावे के हासिल किया है।
