अमेरिका और Iran के बीच जारी तनाव एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय बन गया है। पश्चिम एशिया में कई सप्ताहों से जारी संघर्ष को रोकने के लिए अमेरिका की ओर से पेश किए गए युद्धविराम प्रस्ताव पर ईरान की ओर से सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने तीखी नाराजगी जाहिर की है। ट्रंप ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर ईरान के रुख को “पूरी तरह अस्वीकार्य” बताते हुए कहा कि उन्हें ईरानी प्रतिनिधियों का जवाब बिल्कुल पसंद नहीं आया।
इस घटनाक्रम ने पहले से संवेदनशील पश्चिम एशिया क्षेत्र में एक बार फिर तनाव बढ़ा दिया है। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का मानना है कि यदि दोनों देशों के बीच मतभेद जल्द कम नहीं हुए, तो इसका असर वैश्विक राजनीति, तेल बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है।
अमेरिका ने क्यों रखा था युद्धविराम प्रस्ताव?
अमेरिका ने यह युद्धविराम प्रस्ताव पश्चिम एशिया में पिछले लगभग 10 सप्ताह से जारी संघर्ष को कम करने और शांति वार्ता की दिशा में आगे बढ़ने के उद्देश्य से तैयार किया था। वाशिंगटन प्रशासन का मानना था कि लगातार बढ़ते तनाव से क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है, जिसका असर अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल आपूर्ति और सुरक्षा व्यवस्था पर पड़ सकता है।अमेरिका चाहता था कि पहले संघर्ष समाप्त किया जाए और उसके बाद परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर व्यापक बातचीत शुरू हो। लेकिन ईरान ने अमेरिकी प्रस्ताव को अपनी शर्तों के खिलाफ बताते हुए उसमें रुचि नहीं दिखाई।सूत्रों के मुताबिक, तेहरान का मानना है कि अमेरिकी प्रस्ताव में उसकी प्रमुख मांगों और सुरक्षा चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसी कारण ईरान ने इसे लगभग “एकतरफा समझौता” और “आत्मसमर्पण जैसा प्रस्ताव” माना।
ट्रंप का तीखा बयान
डोनाल्ड ट्रम्प ने अपनी पोस्ट में कहा,“मैंने अभी-अभी ईरान के तथाकथित प्रतिनिधियों का जवाब पढ़ा है। मुझे यह पसंद नहीं आया। यह पूरी तरह ना मंजूर है।”हालांकि उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि ईरान की प्रतिक्रिया में ऐसी कौन-सी बातें थीं, जिनसे अमेरिका नाराज हुआ, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि दोनों देशों के बीच मतभेद अभी भी बेहद गहरे हैं।
ट्रंप पहले भी ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाते रहे हैं। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने ईरान पर कई आर्थिक प्रतिबंध लगाए थे और परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग करने का फैसला भी लिया था। ऐसे में उनका यह नया बयान दोनों देशों के बीच तनाव को और बढ़ा सकता है।
इरान की मांगे
परमाणु कार्यक्रम पर भी बढ़ा विवाद
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी प्रस्ताव में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी विस्तृत बातचीत की बात कही गई थी। अमेरिका चाहता है कि संघर्ष समाप्त होने के बाद परमाणु गतिविधियों पर सख्त निगरानी और समझौते की प्रक्रिया आगे बढ़े। वहीं दूसरी ओर, ईरान ने संकेत दिए हैं कि वह अपने अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम भंडार के एक हिस्से को कम करने पर विचार कर सकता है। साथ ही कुछ संवेदनशील सामग्री को किसी तीसरे देश में स्थानांतरित करने का सुझाव भी सामने आया है। हालांकि इस पर अभी कोई आधिकारिक सहमति नहीं बनी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि परमाणु मुद्दा ही दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है और इसी वजह से वार्ता बार-बार अटक जाती है।
पश्चिम एशिया और दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है?
यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव और बढ़ता है, तो इसका सीधा असर पश्चिम एशिया की स्थिरता पर पड़ सकता है। खासकर Strait of Hormuz को लेकर दुनिया की चिंता बढ़ गई है, क्योंकि यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव वैश्विक तेल सप्लाई को प्रभावित कर सकता है।तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार, शिपिंग रूट और ऊर्जा सुरक्षा पर इसका असर पड़ सकता है।राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि फिलहाल दोनों देशों के बीच अविश्वास की स्थिति बनी हुई है। अमेरिका युद्धविराम और परमाणु नियंत्रण चाहता है, जबकि ईरान आर्थिक राहत और सुरक्षा गारंटी की मांग कर रहा है। ऐसे में बिना बड़े राजनीतिक समझौते के शांति वार्ता का सफल होना फिलहाल मुश्किल नजर आ रहा है।
क्या आगे बढ़ पाएगी शांति वार्ता?
फिलहाल अमेरिका और ईरान दोनों अपने-अपने रुख पर अड़े हुए दिखाई दे रहे हैं। हालांकि अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार तनाव कम करने और बातचीत जारी रखने की अपील कर रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दिनों में कूटनीतिक प्रयास और तेज हो सकते हैं, क्योंकि यदि यह तनाव और बढ़ता है, तो इसका असर केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
