इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन और भारत के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा लगातार बढ़ती जा रही है। एक ओर चाइना पाकिस्तान को लड़ाकू विमान, मिसाइल और एयर डिफेंस सिस्टम देकर उसकी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है, तो दूसरी ओर भारत अब चीन के पड़ोसी देशों को अपनी अत्याधुनिक ब्रह्मोस मिसाइल मिसाइलें उपलब्ध कराकर दक्षिण चीन सागर में ड्रैगन की चुनौती बढ़ा रहा है। फिलीपींस के बाद अब वियतनाम भी भारत से ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने की तैयारी में है। इस संभावित रक्षा सौदे को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की राजनीति और सुरक्षा संतुलन के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वियतनाम दक्षिण चीन सागर में ब्रह्मोस मिसाइलें तैनात करता है, तो इससे चीन की नौसैनिक गतिविधियों पर बड़ा दबाव पड़ सकता है।
दक्षिण चीन सागर को लेकर क्यों बढ़ा तनाव
दक्षिण चीन सागर दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्रों में से एक माना जाता है। इस इलाके से हर साल अरबों डॉलर का व्यापार गुजरता है। यही वजह है कि इस क्षेत्र पर कई देशों का दावा है।चाइना लगभग पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपना दावा करता है, जबकि फिलिपिंश , वियतनाम, मलेशिया,और इंडोनेशिया जैसे देश भी इस समुद्री क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों पर अपना अधिकार जताते हैं। चीन ने पिछले कुछ वर्षों में यहां कृत्रिम द्वीप बनाकर सैन्य ठिकाने तैयार किए हैं। इसके अलावा चीनी नौसेना और कोस्ट गार्ड की गतिविधियां भी लगातार बढ़ी हैं। इसी कारण क्षेत्र के कई देश अपनी सुरक्षा मजबूत करने के लिए आधुनिक हथियार खरीद रहे हैं।
फिलीपींस के बाद अब वियतनाम की नजर ब्रह्मोस पर
भारत पहले ही फिलिपिंश को ब्रह्मोस मिसाइलें दे चुका है और फिलीपींस ने इन्हें दक्षिण चीन सागर में तैनात भी कर दिया है। अब वियतनाम भी इसी राह पर आगे बढ़ता नजर आ रहा है। हाल ही में वियतनाम के राष्ट्रपति To Lam भारत यात्रा पर आए थे। इस दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात की। इसके बाद दोनों देशों ने ब्रह्मोस मिसाइल सौदे पर बातचीत की पुष्टि की। रिपोर्ट्स के मुताबिक यह रक्षा सौदा लगभग 629 मिलियन डॉलर से 700 मिलियन डॉलर के बीच हो सकता है। इसमें मिसाइल सिस्टम के साथ प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक सहायता भी शामिल हो सकती है। अगर यह समझौता पूरा होता है, तो वियतनाम ब्रह्मोस खरीदने वाला तीसरा विदेशी देश बन जाएगा। फिलीपींस और इंडोनेशिया पहले ही इस मिसाइल में गहरी दिलचस्पी दिखा चुके हैं।
ब्रह्मोस मिसाइल
ब्रह्मोस मिसाइल दुनिया की सबसे खतरनाक और तेज सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में गिनी जाती है। इसे भारत और रूस ने मिलकर विकसित किया है। इस मिसाइल का नाम भारत की ब्रह्मपुत्र नदी और रूस की मॉस्कवा नदी के नाम को जोड़कर रखा गया है। ब्रह्मोस मिसाइल को भारतीय रक्षा क्षेत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक माना जाता है। इसकी खासियत इसकी तेज रफ्तार, सटीक निशाना और दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने की क्षमता है। यही वजह है कि आज दुनिया के कई देश इस मिसाइल को खरीदने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ब्रह्मोस केवल एक मिसाइल नहीं, बल्कि आधुनिक युद्ध में रणनीतिक बढ़त दिलाने वाला हथियार माना जाता है। यह जमीन, समुद्र और हवा तीनों प्लेटफॉर्म से लॉन्च की जा सकती है। इसकी तैनाती दुश्मन की नौसेना और सैन्य ठिकानों के लिए बड़ा खतरा मानी जाती है।
ब्रह्मोस मिसाइल की प्रमुख खासियत
- करीब 290 किलोमीटर तक मारक क्षमता
- सुपरसोनिक गति, यानी आवाज की रफ्तार से कई गुना तेज
- लगभग 200 किलोग्राम तक वॉरहेड ले जाने की क्षमता
- समुद्र, जमीन और हवा से लॉन्च करने की सुविधा
- बड़े युद्धपोतों और सैन्य ठिकानों को तबाह करने में सक्षम
- बेहद कम समय में लक्ष्य पर हमला करने की क्षमता
- दुश्मन के रडार और एयर डिफेंस सिस्टम को चकमा देने में सक्षम
इसकी गति इतनी तेज होती है कि दुश्मन के पास प्रतिक्रिया देने के लिए बहुत कम समय बचता है। यही वजह है कि इसे रोकना बेहद मुश्किल माना जाता है। हाल के वर्षों में पाकिस्तान के साथ सैन्य तनाव के दौरान भी ब्रह्मोस मिसाइल की क्षमता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा हुई थी। इसके बाद दुनिया के कई देशों ने इस मिसाइल में रुचि दिखानी शुरू कर दी।
दक्षिण चीन सागर में चीन के लिए बढ़ेगी चुनौती
अगर वियतनाम ब्रह्मोस मिसाइलों को अपने उत्तरी तटीय इलाकों में तैनात करता है, तो इससे चाइना की नौसैनिक गतिविधियों पर बड़ा असर पड़ सकता है। दक्षिण चीन सागर पहले से ही एशिया का सबसे संवेदनशील समुद्री क्षेत्र माना जाता है। यहां चीन लगातार अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा रहा है। चीन ने कई कृत्रिम द्वीपों पर सैन्य ठिकाने बनाए हैं और अपनी नौसेना की ताकत भी बढ़ाई है। ऐसे में अगर वियतनाम के पास ब्रह्मोस जैसी सुपरसोनिक मिसाइलें आती हैं, तो चीन की रणनीतिक चिंता बढ़ सकती है। विशेष रूप से टोंकिन की खाड़ी और हैनान द्वीप के आसपास से गुजरने वाले चीनी युद्धपोतों को खतरा बढ़ सकता है। ब्रह्मोस मिसाइलें बड़े युद्धपोतों, डिस्ट्रॉयर और एम्फीबियस असॉल्ट शिप जैसे बड़े नौसैनिक जहाजों को निशाना बनाने में सक्षम मानी जाती हैं। दक्षिण चीन सागर में ब्रह्मोस की तैनाती चीन की नौसेना की स्वतंत्र गतिविधियों को सीमित कर सकती है। इससे क्षेत्र में शक्ति संतुलन भी बदल सकता है।
वियतनाम की रणनीति क्या है
वियतनाम लंबे समय से चीन की बढ़ती सैन्य ताकत का मुकाबला करने के लिए अपनी समुद्री सुरक्षा को मजबूत कर रहा है। वियतनाम “एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल” यानी A2/AD रणनीति पर काम कर रहा है। इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि दुश्मन की नौसेना को किसी संवेदनशील क्षेत्र में आसानी से प्रवेश न करने दिया जाए।
- लंबी दूरी की मिसाइलें
- तटीय रक्षा प्रणाली
- आधुनिक रडार सिस्टम
- समुद्री निगरानी तकनीक
- नौसैनिक सुरक्षा नेटवर्क
का इस्तेमाल किया जाता है, ब्रह्मोस मिसाइलें वियतनाम की इस रणनीति को काफी मजबूत कर सकती हैं। यदि चीन किसी सैन्य कार्रवाई की कोशिश करता है, तो वियतनाम उसके जहाजों को काफी दूरी से निशाना बना सकता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह सौदा
भारत के लिए यह केवल हथियार बेचने का मामला नहीं है, बल्कि यह इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी रणनीतिक ताकत बढ़ाने का बड़ा अवसर भी माना जा रहा है। भारत लंबे समय से “एक्ट ईस्ट पॉलिसी” के तहत दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ अपने रक्षा और रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा है।
ब्रह्मोस मिसाइल सौदे के जरिए भारत
- चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना चाहता है
- इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है
- रक्षा निर्यात बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है
- दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ सैन्य सहयोग मजबूत कर रहा है
- क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में अपनी भूमिका बढ़ा रहा है
भारत अब सिर्फ हथियार आयात करने वाला देश नहीं रहना चाहता, बल्कि रक्षा निर्यात के क्षेत्र में भी बड़ी ताकत बनना चाहता है। ब्रह्मोस सौदे इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
