करीब दस वर्षों के अंतराल के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की चीन यात्रा वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में नई हलचल पैदा कर रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump 13 से 15 मई तक चीन दौरे पर रहेंगे, जहां उनकी मुलाकात चीनी राष्ट्रपति Xi Jinping से होगी। यह यात्रा ऐसे समय हो रही है जब दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक अविश्वास लगातार बढ़ रहा है। अमेरिकी कंपनियों जैसे Boeing, Citigroup और Qualcomm के शीर्ष अधिकारियों का ट्रंप के साथ जाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका चीन के साथ नए कारोबारी अवसरों और निवेश समझौतों की तलाश भी कर रहा है।
ट्रेड
वॉर से शुरू हुई खाई
साल 2018 में ट्रंप प्रशासन ने चीन से आयातित लगभग 250 अरब डॉलर के सामान पर भारी टैरिफ़ लगाने की घोषणा की थी। इसे अमेरिका-चीन ट्रेड वॉर की शुरुआत माना गया। ट्रंप का तर्क था कि चीन लंबे समय से अमेरिकी बाजार का फायदा उठा रहा है और अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को नुकसान पहुंचा रहा है। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिकी उत्पादों पर जवाबी शुल्क लगाए। देखते ही देखते दोनों देशों के बीच टैरिफ़ 100 प्रतिशत से अधिक तक पहुंच गए। इस आर्थिक संघर्ष ने केवल व्यापार को प्रभावित नहीं किया, बल्कि वैश्विक सप्लाई चेन, निवेश और रोजगार बाजार को भी झकझोर दिया। उस समय चीन की अर्थव्यवस्था काफी हद तक अमेरिकी बाजार पर निर्भर थी। अमेरिका चीन में बने उत्पादों का सबसे बड़ा खरीदार था। ऐसे में अमेरिकी आयात में गिरावट ने चीन के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर और करोड़ों मजदूरों के रोजगार पर सीधा असर डाला।
चीन की
मुश्किलें और रणनीतिक बदलाव
टैरिफ़ वॉर ने चीन की पहले से मौजूद आर्थिक चुनौतियों को और गंभीर बना दिया। घरेलू मांग में कमी, युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी और रियल एस्टेट संकट ने चीनी अर्थव्यवस्था की गति धीमी कर दी। इसी दौरान चीन ने “मेड इन चाइना” मॉडल से आगे बढ़कर तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज़ी से काम शुरू किया। चीन ने सेमीकंडक्टर, एआई, इलेक्ट्रिक व्हीकल और ग्रीन एनर्जी सेक्टर में भारी निवेश किया ताकि वह अमेरिकी दबाव का मुकाबला कर सके।
बाइडन प्रशासन ने भी नहीं बदली नीति
जब Joe Biden सत्ता में आए, तब उम्मीद थी कि अमेरिका-चीन संबंधों में नरमी आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बाइडन प्रशासन ने ट्रंप द्वारा लगाए गए अधिकांश टैरिफ़ बरकरार रखे। इसके अलावा अमेरिकी सरकार ने चीनी टेक कंपनियों, विशेष रूप से Huawei, पर कड़े प्रतिबंध लगाए। अमेरिका का आरोप था कि चीन तकनीकी विस्तार के जरिए राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती दे रहा है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म TikTok को लेकर भी अमेरिका ने कठोर रुख अपनाया। इसके अतिरिक्त चीन के इलेक्ट्रिक वाहनों पर भारी शुल्क लगाकर उन्हें अमेरिकी बाजार से लगभग बाहर कर दिया गया।

इस बार चीन क्यों दिख रहा है ज्यादा आत्मविश्वासी
विशेषज्ञों का मानना है कि 2018 की तुलना में आज चीन कहीं अधिक तैयार स्थिति में है। बीते वर्षों में चीन ने एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत किए हैं।
साथ ही, चीन अब केवल सस्ते उत्पादों का निर्यातक नहीं, बल्कि हाई-टेक और ग्रीन टेक्नोलॉजी का बड़ा खिलाड़ी बन चुका है। इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी और सोलर पैनल जैसे क्षेत्रों में चीन का दबदबा तेजी से बढ़ा है।
दूसरी ओर अमेरिका भी आर्थिक दबावों से जूझ रहा है। बढ़ती महंगाई, सप्लाई चेन की समस्याएं और घरेलू राजनीतिक ध्रुवीकरण ट्रंप प्रशासन के लिए चुनौती बने हुए हैं। ऐसे में ट्रंप के लिए चीन पर पूरी तरह आक्रामक रुख बनाए रखना पहले जितना आसान नहीं माना जा रहा।
क्या अमेरिका-चीन संबंध अब नए शीत युद्ध की ओर बढ़ रहे हैं
अमेरिका
और चीन के बीच संघर्ष अब केवल व्यापार तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुकाबला
वैश्विक नेतृत्व, तकनीकी श्रेष्ठता
और भविष्य की अर्थव्यवस्था पर नियंत्रण का संघर्ष बन चुका है।
