भारत और नेपाल के बीच दशकों पुराना गोरखा सैनिक भर्ती संबंध एक बार फिर चर्चा में है। भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती को लेकर जारी विवाद अब राजनीतिक और कूटनीतिक बहस का रूप लेता जा रहा है। नेपाल ने वर्ष 2022 में भारत की नई अग्निपथ योजना लागू होने के बाद नेपाली युवाओं की भर्ती पर रोक लगा दी थी। तब से भारतीय सेना में एक भी नेपाली गोरखा सैनिक की भर्ती नहीं हुई है। अब नेपाल में कुछ बुद्धिजीवियों और विदेश नीति विशेषज्ञों ने इस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि बदलते समय में नेपाल को विदेशी सेनाओं में अपने नागरिकों की भर्ती की नीति पर दोबारा विचार करना चाहिए।
क्या है पूरा विवाद
भारत सरकार ने वर्ष 2022 में अग्निपथ योजना की शुरुआत की थी। इस योजना के तहत युवाओं को चार वर्षों के लिए सेना में भर्ती किया जाता है और उनमें से केवल कुछ को स्थायी सेवा का मौका मिलता है। नेपाल ने इस योजना पर आपत्ति जताई थी। नेपाल सरकार का कहना था कि गोरखा भर्ती भारत और नेपाल के बीच पुराने त्रिपक्षीय समझौते के तहत होती है और नई भर्ती नीति उस समझौते की भावना से मेल नहीं खाती। इसी वजह से नेपाल ने भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती पर रोक लगा दी। इसके बाद से भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंटों में नेपाल से नई भर्ती बंद है।
गोरखा भर्ती का लंबा इतिहास
नेपाल के वरिष्ठ पत्रकार और विदेश नीति विशेषज्ञ कनक मणि दीक्षित ने इस मुद्दे पर विस्तार से टिप्पणी की है। उन्होंने लिखा कि नेपाली नागरिक वर्ष 1818 से ही ब्रिटिश सेना में सेवा देते आ रहे हैं। भारत की आजादी के बाद 1947 में भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। इसके तहत तत्कालीन गोरखा ब्रिगेड को दो हिस्सों में बांटा गया। छह गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना में शामिल हो गईं, जबकि चार ब्रिटिश सेना का हिस्सा बनी रहीं। तब से नेपाली नागरिक भारतीय और ब्रिटिश सेना में भर्ती होते रहे हैं। लंबे समय तक इसे नेपाल के पहाड़ी इलाकों के युवाओं के लिए सम्मानजनक रोजगार और आर्थिक अवसर के रूप में देखा जाता रहा।
नेपाल में उठ रही है विरोध की आवाज
नेपाल में अब कुछ बुद्धिजीवियों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक आधुनिक और संप्रभु राष्ट्र के रूप में नेपाल को अपने नागरिकों की विदेशी सेनाओं में भर्ती की नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए। कनक मणि दीक्षित ने कहा कि गोरखा भर्ती ने नेपाल के हजारों परिवारों को आर्थिक स्थिरता दी है, लेकिन अब इस मुद्दे पर नई पीढ़ी के बीच अलग तरह की सोच उभर रही है नेपाल को अपने युवाओं के लिए देश के भीतर ही रोजगार और सैन्य अवसर तैयार करने चाहिए, बजाय इसके कि वे विदेशी सेनाओं पर निर्भर रहें। हालांकि दूसरी ओर बड़ी संख्या में लोग अब भी गोरखा भर्ती को रोजगार, सम्मान और भारत-नेपाल संबंधों का मजबूत आधार मानते हैं। नेपाल के कई ग्रामीण और पहाड़ी इलाकों में आज भी भारतीय सेना में भर्ती होना गर्व और स्थिर भविष्य का प्रतीक माना जाता है।
भारत-नेपाल संबंधों पर असर
गोरखा भर्ती केवल सैन्य मामला नहीं बल्कि भारत और नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंटों ने कई युद्धों और सैन्य अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा, सांस्कृतिक संबंध और ऐतिहासिक साझेदारी के बीच गोरखा भर्ती एक मजबूत कड़ी रही है। ऐसे में भर्ती पर रोक को दोनों देशों के रिश्तों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यदि यह विवाद लंबा खिंचता है तो इसका असर भारत-नेपाल रक्षा सहयोग पर भी पड़ सकता है।
नेपाल की राजनीति में भी बन रहा मुद्दा
नेपाल में कई सरकारें बदलने के बावजूद गोरखा भर्ती का मुद्दा अब तक हल नहीं हो पाया है। इस बीच नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेन शाह को भी इस विषय पर सलाह दी जा रही है कि वे स्पष्ट नीति अपनाएं।नेपाल के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग राजनीतिक दलों की राय भी अलग है। कुछ दल भारत के साथ पुराने समझौते को जारी रखने के पक्ष में हैं, जबकि कुछ इसे बदलने की मांग कर रहे हैं।
भारतीय सेना के लिए महत्वपूर्ण हैं गोरखा
भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट दुनिया की सबसे बहादुर सैन्य इकाइयों में गिनी जाती है। गोरखा सैनिकों की वीरता और अनुशासन की पहचान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रही है। उन्होंने भारत के कई युद्धों और सैन्य अभियानों में अहम भूमिका निभाई है। यही कारण है कि भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की विशेष प्रतिष्ठा मानी जाती है। यदि नेपाल से भर्ती लंबे समय तक बंद रहती है तो इसका असर भविष्य में गोरखा रेजिमेंटों की संरचना और परंपरा पर पड़ सकता है।
निकल सकता है समाधान
इस मुद्दे का समाधान केवल बातचीत और आपसी सहमति से ही संभव है। भारत और नेपाल दोनों देशों को नई परिस्थितियों के अनुसार कोई व्यावहारिक रास्ता निकालना होगा। संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में अग्निपथ योजना को लेकर कुछ विशेष प्रावधान या अलग व्यवस्था बनाकर नेपाली गोरखाओं की भर्ती दोबारा शुरू करने पर चर्चा हो सकती है। फिलहाल यह मुद्दा केवल सैन्य भर्ती तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह भारत-नेपाल संबंध, रोजगार, राष्ट्रीय संप्रभुता और क्षेत्रीय राजनीति से जुड़ा बड़ा विषय बन चुका है।
