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भारतीय कंपनियों को भी झटका
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नया फरमान : H-1B वीजा पर ट्रंप प्रशासन का नया दांव, भारतीय IT सेक्टर में बढ़ी बेचैनी

अमेरिका में H-1B वीजा नियमों को लेकर बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है। अमेरिकी श्रम विभाग विदेशी कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन में औसतन 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी करना चाहता है। इस कदम का सबसे बड़ा असर भारतीय IT प्रोफेशनल्स और टेक कंपनियों पर पड़ सकता है, क्योंकि H-1B वीजा का सबसे ज्यादा लाभ भारतीय कर्मचारी उठाते हैं। विशेषज्ञ मान रहे हैं कि इससे अमेरिका में भारतीय युवाओं के लिए नौकरी पाना कठिन और महंगा हो सकता है।

कीर्तिमान न्यूज
10 May 2026, 06:16 PM
वाशिंगटन

अमेरिका में विदेशी कर्मचारियों को लेकर एक बार फिर सियासी और आर्थिक बहस तेज हो गई है। United States के श्रम विभाग ने H-1B वीजा से जुड़े वेतन नियमों में बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया है। इस प्रस्ताव के तहत विदेशी कर्मचारियों के न्यूनतम वेतन में औसतन 30 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की जा सकती है। माना जा रहा है कि यदि यह नियम लागू होते हैं तो इसका सीधा असर भारतीय IT सेक्टर और अमेरिका में नौकरी की तैयारी कर रहे हजारों युवाओं पर पड़ेगा।

अमेरिकी श्रम विभाग ने “Improving Wage Protections for the Temporary and Permanent Employment of Certain Foreign Nationals in the United States” नाम से जारी ड्राफ्ट नियम में कहा है कि मौजूदा वेतन संरचना लगभग 20 साल पुरानी हो चुकी है। विभाग का तर्क है कि कई कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को अपेक्षाकृत कम वेतन पर नियुक्त कर अमेरिकी कर्मचारियों के अवसरों और वेतन संतुलन को प्रभावित करती हैं। नए प्रस्ताव का उद्देश्य इसी असमानता को कम करना बताया जा रहा है।

प्रस्ताव के मुताबिक एंट्री लेवल विदेशी कर्मचारियों का न्यूनतम वेतन 73,279 डॉलर से बढ़ाकर 97,746 डॉलर किया जा सकता है। यानी शुरुआती स्तर पर ही करीब 30 प्रतिशत की वृद्धि। अनुभवी कर्मचारियों के वेतन मानकों में भी बड़ी बढ़ोतरी की योजना है। इससे कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना पहले की तुलना में काफी महंगा हो सकता है।

इस फैसले का सबसे बड़ा प्रभाव भारत पर पड़ने की संभावना है। India दुनिया में सबसे ज्यादा H-1B वीजा पाने वाला देश है। हर साल हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और टेक विशेषज्ञ अमेरिका में नौकरी के लिए जाते हैं। बड़ी टेक कंपनियां बढ़े हुए वेतन को संभाल सकती हैं, लेकिन छोटे स्टार्टअप्स और मिड-साइज कंपनियों के लिए यह अतिरिक्त लागत चुनौती बन सकती है। इससे एंट्री लेवल भारतीय प्रोफेशनल्स के लिए अमेरिकी नौकरी बाजार में अवसर सीमित हो सकते हैं।

अमेरिका में इस प्रस्ताव को लेकर राय बंटी हुई है। समर्थकों का कहना है कि इससे अमेरिकी कर्मचारियों के हित सुरक्षित होंगे और कंपनियां केवल सस्ते विदेशी श्रमिकों पर निर्भर नहीं रहेंगी। वहीं आलोचकों का मानना है कि इससे अमेरिकी टेक इंडस्ट्री में टैलेंट की कमी बढ़ सकती है और इनोवेशन प्रभावित हो सकता है। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि विदेशी प्रतिभाओं पर ज्यादा सख्ती अमेरिका की वैश्विक प्रतिस्पर्धा को कमजोर कर सकती है।

फिलहाल यह प्रस्ताव सार्वजनिक सुझावों के लिए जारी किया गया है और 26 मई तक लोगों से राय मांगी गई है। इसके बाद अमेरिकी सरकार अंतिम निर्णय लेगी। यदि यह नियम लागू होते हैं तो H-1B के साथ-साथ H-1B1, E-3 और PERM लेबर सर्टिफिकेशन प्रोग्राम भी प्रभावित होंगे। इसे Donald Trump प्रशासन के पुराने “अमेरिका फर्स्ट” रोजगार एजेंडे की वापसी के रूप में भी देखा जा रहा है।

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