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मनुष्य और उसकी जीवन शैली पर मलय ने लिखा
संपादकीय

मलय बेनर्जी का लिखा : मनुष्य होने की योग्यता और समाज का बदलता चेहरा

लेखक ने बंगाल की सामाजिक परिस्थितियों के माध्यम से मनुष्यता, संस्कार और हिंसा पर गहन विचार व्यक्त किए हैं। उनके अनुसार खेल मानव की हिंसक प्रवृत्तियों का रचनात्मक रूपांतरण है, लेकिन जब यही खेल उन्माद और राजनीति का माध्यम बन जाता है, तब समाज में अमानुषिकता और हिंसा बढ़ने लगती है।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 07 May 2026, 04:01 PM · अपडेट: 12 Sep 2026, 03:14 PM
बंगाल विशेष
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

मलय बेनर्जी

सारी मछलियां हिल्सा नहीं होतीं, सारे कुत्ते जर्मन शेफर्ड नहीं होते, सारे पक्षी कबूतर नहीं होते, सारी गायें थारपारक या साहीवाल नहीं होती, सारे फूल गुलाब नहीं होते, सारे वृक्ष वट या अश्वत्थ नहीं होते...फिर क्यों बंगाल के आध्यात्मिक संतों ने कहा था कि सारे मनुष्य एक होते हैं

इसी प्रकार दो टांगों पर चलने वाला हर प्राणी मनुष्य नहीं होता, मनुष्य होने के लिए मनुषत्व की आवश्यकता होती है...और सच तो ये है कि बंगाल में, दो टांगों पर चलने वाले प्राणियों का एक बड़ा तबका, मनुष्य होने की योग्यता खो चुका है...ईश्वर करे कि परिवर्तन की लहर के साथ इनमें मनुषत्व का संचार भी हो

दरअसल कोई हमें अहिंसा का कितना भी पाठ पढ़ा ले और सफेद कपड़े पहनकर नंगे पांव सड़कों पर घूमता रहे...जब तक हमारे हाथ पैर की उंगलियों के नाखून बढ़ते रहेंगे हम हिंसक बने रहेंगे...मनुष्यता तो तब है जबकि हम अपने इस प्राकृतिक हिंसात्मक प्रवृत्ति का रचनात्मक रूपांतरण कर डालें...और पूरे देश में पश्चिम बंगाल शायद एकमात्र ऐसा राज्य है जिसने इसे करके दिखाया भी है...

दरअसल खेल हमारी हिंसात्मक प्रवृत्ति का रचनात्मक रूपांतरण है...खेलों का आभिर्भाव इसी तरह से हुआ है...जितनी चौड़ी छाती और शारीरिक बल एक योद्धा को नायक बनाती है...उतनी ही चौड़ी छाती और शारीरिक बल एक खिलाड़ी को भी नायक बनाती है...फुटबॉल को लेकर बंगाल का पागलपन हिंसात्मक प्रवृत्ति की रचनात्मक रूपांतरण की पराकाष्ठा है...लेकिन ये रूपांतरण बड़ा ही संवेदनशील है...इसमें छेड़छाड़ कतई बर्दाश्त नहीं है...अगर ऐसा किया गया तो रुपांतरण पलट जाता है...जिस तरह से कलम किया हुआ पौधा कुछ समय बाद अपने मूल स्वरूप में लौट आता है...उसी तरह छेड़छाड़ से हिंसा का रचनात्मक रूपांतरण फिर से हिंसा में लौट जाता है...और बंगाल में ऐसा होते हुए भी हम देख रहे हैं...

दरअसल गड़बड़ तब शुरू होती है जब खेल को खेला में बदल दिया जाता है...तब हिंसा का रचनात्मक रूपांतरण स्टेडियम की दर्शक दीर्घा को तोड़कर सीधे लोगों की रगो में बहने वाली खून में शामिल हो जाता है...परिणाम ये होता है कि एक बार फिर से नाखून तेजी से बढ़ने लगते हैं...खून में शामिल खेला पैर की उंगलियों से ज्वार की तरह ऊपर उठता है और सिर पर खोपड़ी की हड्डियों से तेज लहर की तरह आकर टकराता है...लोग विवेक शून्य हो जाते हैं और उन्हें लगता है कि बढ़ते हुए नाखून की उपयोगिता मनुष्यता का गला घोंटने के लिए ही है...यही बंगाल में हो रहा है...

दरअसल इस पूरे कायनात में दो टांगों पर चलने वाले हम एकमात्र प्राणी हैं जिनका जन्म कोरे कागज़ की तरह होता है...हमें आनुवांशिक रूप से कुछ भी नहीं मिलता...जन्म से लेकर मृत्यु तक संस्कारों के माध्यम से हमारे अंदर मनुष्यता का संचार किया जाता है...अगर इन संस्कारों को देने और लेने में व्यतिक्रम उत्पन्न हो जाए...तो हम मनुष्यता को प्राप्त नहीं कर पाते और केवल दो टांगों पर चलने वाले प्राणी बनकर रह जाते हैं...अमेरिकी लेखक एडगर राइस बरोज़ (Edgar Rice Burroughs) का टार्जन और अंग्रेज लेखक रुडयार्ड किपलिंग (Rudyard Kipling) का मोगली इसका सबसे अच्छा उदाहरण है...टार्जन और मोगली हमारे ही जैसे दिखने वाले थे, पर हम जैसे नहीं थे...टार्जन गोरिल्लाओं की बीच पला-बढ़ा तो वो उनके जैसा हो गया और मोगली भेड़ियों के बीच पला-बढ़ा तो वो उनके जैसा हो गया...लेकिन बंगाल तो संस्कारों की धरती है, फिर वहां के लिए ये उदाहरण क्यों...?

दरअसल ज्ञान का अहंकार बड़ा ही खतरनाक होता है...आप कभी भी अपने बच्चों के लिए अंतिम लकीर मत खींचिए...उन्हें कभी मत कहिए की फलाने से बड़ा कवि या ढेकाने से बड़ा देशभक्त कोई नहीं हो सकता...किसी भी क्षेत्र में उनके आगे बढ़ने की संभावनाओं को खत्म मत करिए अन्यथा उनकी दृष्टि और मानसिकता संकुचित हो जाएगी...उनके ‘मैं’ का संकुचन, दायरे के बाहर के ‘हम’ को स्वीकार नहीं कर पाएगा...व्यापकता को अस्विकार करना ही अमानुषिक है...तय हमें करना है कि हम दो टांगों पर चलने वाले प्राणी बने या मनुष्य। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और ये उनके निजी विचार हैं)

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