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शिखर बैठक : ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक साझेदारी को नया आयाम देने की तैयारी

भारत मई के अंत में चौथी भारत–अफ्रीका शिखर बैठक आयोजित करने जा रहा है, जिसमें अफ्रीका के सभी 54 देशों के शामिल होने की संभावना है। यह बैठक लगभग 10 साल बाद हो रही है, जिसका उद्देश्य द्विपक्षीय संबंधों को फिर से मजबूत करना है। अफ्रीका भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा और रणनीतिक संसाधनों (तेल, गैस, यूरेनियम और रेयर अर्थ मिनरल्स) का महत्वपूर्ण स्रोत बन सकता है, जिससे पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम होगी। भारत अपनी बड़ी तेल जरूरतों के लिए अभी भी मुख्यतः आयात पर निर्भर है, इसलिए अफ्रीका एक वैकल्पिक और स्थिर आपूर्ति क्षेत्र के रूप में उभर सकता है।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 25 Apr 2026, 01:01 PM · अपडेट: 11 Oct 2026, 05:02 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

भारत इस वर्ष मई के अंत में अफ्रीकी देशों के साथ चौथी भारत–अफ्रीका शिखर बैठक आयोजित करने जा रहा है। यह एक बड़ा राजनयिक आयोजन माना जा रहा है, जिसमें अफ्रीकी महाद्वीप के सभी 54 देशों के राष्ट्राध्यक्षों और प्रमुख प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। यह शिखर सम्मेलन लगभग एक दशक के लंबे अंतराल के बाद हो रहा है, क्योंकि पिछली बैठक वर्ष 2015 में आयोजित हुई थी। उसके बाद यह संवाद प्रक्रिया धीमी पड़ गई थी, जिसे अब फिर से सक्रिय करने की कोशिश की जा रही है।

अफ्रीका को भारत के लिए आज केवल एक साझेदार नहीं, बल्कि एक रणनीतिक संसाधन केंद्र के रूप में देखा जा रहा है। तेल, प्राकृतिक गैस, यूरेनियम, रेयर अर्थ तत्वों और अन्य क्रिटिकल मिनरल्स से समृद्ध यह महाद्वीप भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों, विशेषकर पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता जोखिमपूर्ण हो सकती है।

सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था

भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का 87 प्रतिशत से अधिक हिस्सा आयात करता है, जिसमें आधे से अधिक तेल और दो-तिहाई गैस पश्चिम एशियाई देशों से आता है। ऐसे में किसी भी भू-राजनीतिक संकट, जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य में बाधा, का सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। इसके विपरीत, अफ्रीकी देश जैसे नाइजीरिया, अंगोला, अल्जीरिया, लीबिया और मिस्र भी बड़े तेल उत्पादक हैं और वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत बन सकते हैं।

मिल सकता हैं सस्ता ऊर्जा स्रोत 

वर्तमान में भारत अपनी कुल ऊर्जा जरूरतों का लगभग 15 प्रतिशत ही अफ्रीका से आयात करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अफ्रीका के साथ व्यापार और ऊर्जा सहयोग को बढ़ाया जाए तो भारत को अधिक स्थिर और अपेक्षाकृत सस्ता ऊर्जा स्रोत मिल सकता है। इससे वैश्विक बाजारों पर निर्भरता भी कम होगी और आपूर्ति श्रृंखला अधिक विविध बन सकेगी। भारत और अफ्रीका के बीच आर्थिक संबंधों की शुरुआत 2008 में भारत–अफ्रीका शिखर सम्मेलन से हुई थी, जो नई दिल्ली में आयोजित हुआ था। 

इसके बाद 2011 में दूसरा सम्मेलन इथियोपिया की राजधानी अदीस अबाबा में हुआ। इन प्रयासों के परिणामस्वरूप द्विपक्षीय व्यापार लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुंच गया, हालांकि यह अभी भी चीन के लगभग 300 अरब डॉलर के व्यापार की तुलना में कम है।

बढ़ रही वैश्विक मांग  

अब नए शिखर सम्मेलन में रक्षा, ऊर्जा, खनन, शिक्षा और तकनीकी सहयोग जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। अफ्रीकी देशों में चीन पहले से ही भारी निवेश कर चुका है, खासकर खनिज संसाधनों और कृषि भूमि के क्षेत्र में। इसलिए भारत के लिए यह जरूरी है कि वह भी अपनी उपस्थिति को मजबूत करे, विशेषकर रेयर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स के क्षेत्रों में, जिनकी वैश्विक मांग तेजी से बढ़ रही है।

सकारात्मक छवि 

ऐतिहासिक रूप से भी भारत और अफ्रीका के संबंध गहरे रहे हैं। लगभग 30 लाख भारतीय मूल के लोग अफ्रीकी देशों में रहते हैं। भारत ने अफ्रीकी स्वतंत्रता आंदोलनों का समर्थन किया और आजादी के बाद भी विकास सहयोग जारी रखा। सांस्कृतिक रूप से भी भारतीय फिल्में, शिक्षा और चिकित्सा सहयोग ने अफ्रीकी समाज में भारत के प्रति सकारात्मक छवि बनाई है। अब आवश्यकता इस बात की है कि इस शिखर सम्मेलन को केवल औपचारिकता न बनाकर ठोस आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी में बदला जाए, ताकि दोनों क्षेत्र वैश्विक मंच पर एक मजबूत और संतुलित साझेदारी के रूप में उभर सकें।

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