बिरकोनी के आदर्श ग्राम बरबसपुर में चल रही श्रीमद् भागवत महापुराण ज्ञान यज्ञ कथा महोत्सव के चौथे व पांचवे दिन की कथाव्यास पंडित रूपनारायण शर्मा ने समृद्र मंथन, कृष्ण जन्म, कृष्णा बाल लीला, गोवर्धन पर्वत, कंस वध कथा का रसपान श्रद्धालुओं को कराया। जिसमें प्रथम प्रसंग पर बताया कि मानव हृदय ही संसार रूपी सागर हैं।
मनुष्य के अच्छे और बुरे विचार ही देवता व दानव के द्वारा किया जाने वाला मंथन हैं। कभी हमारे अंदर अच्छे विचारों का चिंतन मंथन चलता रहता है। जिनके अंदर दानव जीत गया उनका जीवन दुखी परेशान और कष्ट कठिनाइयों से भरा होगा और जिनके अंदर देवता जीत गया उनका जीवन सुखी, संतुष्ट और भगवत प्रेम से भरा हुआ होगा। इस लिए हमेश अपने विचारों पर पैनी नजर रखते हुए बुरे विचारों को अच्छे विचारों से जीतते हुए अपने मानव को सुखमय एवं आनंदमय बनाना चाहिए।
भक्त हुए भावविभोर
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म की अद्भुत लीला का वर्णन करते हुए बताया कि कंस के बड़ते अत्याचार को देखते हुए, भक्तों ने भगवान विष्णु से रक्षा की प्रार्थना की और देवकी के गर्भ से श्रीकृष्ण ने जन्म लिया। जैसे ही कृष्ण जन्म हुई, पूरा वातावरण नंद के आनंद भयो जय कन्हैया लाल की' के जयघोष से गूंज उठा। श्रद्धालु भक्त भावविभोर होकर नाचने लगे। बाल कृष्ण की विविध लीला में माखन चोरी की घटनाओं का सुंदर और सरस वर्णन किया।

सजाई गई भव्य झांकी
श्रोताओं ने इन लीलाओं को मंत्रमुग्ध होकर झूमते हुए आनंद लिया। इस दौरान श्रद्धालुओं द्वारा भव्य झांकी सजाई गई और कथा स्थल को फूलों की वर्षा की गई। उन्होंने बताया कि कंस ने कृष्ण को मरने अनेक प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो पाया।
तब धरती पर पाप को मिटने के लिए भगवान कृष्ण ने उसका वध कर अपने माता-पिता वासुदेव व देवकी को बंदी ग्रह से छुड़ाया तथा वासुदेव का राज्याभिषेक किया।भगवान इंद्र और गोवर्धन पर्वत की कथा में कथावाचक ने बताया कि भगवान इंद्र की पूजा जब बृजवासियों ने नहीं की तो इंद्र भगवान क्रोधित होकर बृज को जलमग्न करने के लिए सामवर्तक मेघ को आदेश दिए।
मेघों ने मूसलाधार बारिश की।
कर्म का दिया संदेश
भगवान ने बृजवासियों की रक्षा करने और उनके अभिमान को तोड़ने के लिए अपने कनिष्ठिका उंगली की नोक पर गोवर्धन पर्वत को धारण कर सात कोश के गोवर्धन को सात दिन तक भगवान ने उठाए रखा। फिर इंद्र ने आकर भगवान से क्षमा मांगी। भगवान ने इंद्र को क्षमा कर दिया। अगर हम बिना कर्म करे फल की प्राप्ति चाहेंगे तो वह कभी नहीं मिलेगा, कर्म तो हमें करना ही होगा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में ग्रामवासी की उपस्थिति रही।
