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चतुर्दशी से जुड़ी भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथा
चतुर्दशी से जुड़ी भगवान जगन्नाथ की पौराणिक कथा
धर्म

चतुर्दशी विशेष : भगवान जगन्नाथ की अधूरी मूर्तियों के पीछे की दिव्य कहानी 

चतुर्दशी तिथि से जुड़ी भगवान जगन्नाथ के प्राकट्य की यह पौराणिक कथा भक्ति, धैर्य और विश्वास का संदेश देती है। मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न की तपस्या और भगवान विष्णु की कृपा से पुरी में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के दिव्य स्वरूप प्रकट हुए, जिनकी आज भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है।

कीर्तिमान नेटवर्क
30 May 2026, 03:47 PM
उड़ीसा
चतुर्दशी का महत्व विशेष रूप से ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष चतुर्दशी से जुड़ा है। मान्यता है कि इसी तिथि को राजा इंद्रद्युम्न को समुद्र से वह दिव्य दारु (पवित्र लकड़ी) प्राप्त हुई थी, जिससे बाद में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियों का निर्माण हुआ। इसके अलावा इसी कालखंड में भगवान के प्राकट्य की अद्भुत लीला भी संपन्न हुई, इसलिए यह तिथि जगन्नाथ भक्तों के लिए अत्यंत पवित्र मानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से चतुर्दशी पूर्णिमा या अमावस्या से एक दिन पहले आने वाली 14वीं तिथि होती है। इस कथा के संदर्भ में चतुर्दशी हमें धैर्य, विश्वास और भगवान की इच्छा के प्रति समर्पण का संदेश देती है। राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान के दर्शन के लिए कठिन तपस्या की, लेकिन अधीरता के कारण मूर्तियां अधूरी रह गईं। फिर भी भगवान ने उसी अधूरे स्वरूप को स्वीकार कर जगन्नाथ रूप में संसार के कल्याण का मार्ग चुना। इसलिए चतुर्दशी को केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भक्ति, धैर्य और ईश्वर पर अटूट विश्वास का प्रतीक भी माना जाता है। 

चतुर्दशी तिथि की पौराणिक कथा

प्राचीन काल में मालवा देश में राजा इंद्रद्युम्न नाम के एक महान और परम विष्णु भक्त राजा राज्य करते थे। एक दिन उन्हें पता चला कि उत्कल प्रदेश (वर्तमान ओडिशा) के नील पर्वतों के बीच भगवान विष्णु स्वयं नीलमाधव के रूप में विराजमान हैं। यह सुनकर राजा के मन में भगवान के दर्शन की तीव्र इच्छा जागी। उन्होंने अपने विश्वस्त दूत विद्यापति को नीलमाधव की खोज में भेजा। कई कठिनाइयों के बाद विद्यापति ने स्थानीय शबर जनजाति के प्रमुख विश्ववसु की सहायता से भगवान नीलमाधव के दर्शन किए। जब यह समाचार राजा इंद्रद्युम्न को मिला तो वे स्वयं विशाल सेना और भक्तों के साथ वहां पहुंचे। लेकिन तब तक भगवान नीलमाधव अंतर्ध्यान हो चुके थे। भगवान के दर्शन न होने से राजा अत्यंत दुखी हो गए और उन्होंने अन्न-जल त्याग दिया।
राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने आकाशवाणी की—“हे राजन! शोक मत करो। समुद्र तट पर तुम्हें एक दिव्य दारु (लकड़ी का लट्ठा) प्राप्त होगा। उसी से मेरी नई मूर्ति का निर्माण कराओ।”
राजा तुरंत समुद्र तट पर पहुंचे। कुछ दिनों बाद समुद्र की लहरों पर एक अद्भुत, सुगंधित और दिव्य लकड़ी तैरती हुई दिखाई दी। ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान की कृपा से उस दिव्य दारु को समुद्र से बाहर निकालकर तट पर लाया गया।अब समस्या थी कि उस दिव्य लकड़ी को कोई भी शिल्पकार काट या तराश नहीं पा रहा था। तभी एक वृद्ध बढ़ई राजा के पास आया। वास्तव में वह स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा थे, जो भगवान की प्रेरणा से वहां पहुंचे थे। उन्होंने कहा, “मैं भगवान की मूर्तियां बनाऊंगा, लेकिन मेरी एक शर्त है। मुझे 21 दिनों तक एक बंद कक्ष में अकेले काम करने दिया जाए। इस दौरान कोई भी दरवाजा नहीं खोलेगा।” राजा ने शर्त स्वीकार कर ली। वृद्ध शिल्पकार कमरे में बंद होकर मूर्तियां बनाने लगे। कई दिनों तक अंदर से छेनी-हथौड़ी की आवाजें आती रहीं। लेकिन 20वें दिन अचानक सारी आवाजें बंद हो गईं। रानी गुंडिचा चिंतित हो उठीं। उन्हें लगा कि कहीं वृद्ध शिल्पकार के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई।
रानी के आग्रह पर राजा अपना धैर्य खो बैठे और चतुर्दशी तिथि के दिन ही कमरे का दरवाजा खोल दिया। दरवाजा खुलते ही वृद्ध शिल्पकार गायब हो चुके थे। वहां भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तियां रखी थीं, लेकिन वे पूरी तरह तैयार नहीं थीं। उनके हाथ-पैर अधूरे थे। यह देखकर राजा इंद्रद्युम्न बहुत दुखी हुए। तब उसी रात भगवान ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “राजन! चिंता मत करो। यह सब मेरी इच्छा से हुआ है। मैं इसी अधूरे स्वरूप में जगन्नाथ के रूप में पूजित होऊंगा और संसार के सभी भक्तों का कल्याण करूंगा।” तब से भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की वही अद्भुत मूर्तियां पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में विराजमान हैं। माना जाता है कि चतुर्दशी और पूर्णिमा के आसपास हुई इस दिव्य घटना की स्मृति में आज भी पुरी में भव्य स्नान यात्रा उत्सव और अन्य धार्मिक आयोजन किए जाते हैं।
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