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एनसीईआरटी की किताब में बड़ा बदलाव
एनसीईआरटी की किताब में बड़ा बदलाव
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एनसीईआरटी की किताब में बदलाव : नौवीं की सोशल साइंस बुक से संविधान की प्रस्तावना गायब, इमरजेंसी पर नया चैप्टर जुड़ा

एनसीईआरटी ने नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब से संविधान की प्रस्तावना हटा दी है। इस बार पुस्तक में संप्रभुता, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों का विस्तार से जिक्र नहीं है। इसकी जगह वर्ष 1975 में लगी देश की इमरजेंसी पर एक पूरा नया खंड जोड़ा गया है। गुरुवार को यह बड़ा बदलाव सामने आने के बाद से चर्चा जारी है।

विशेष संवाददाता
26 Jun 2026, 04:13 PM
रायपुर
राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी ने कक्षा नौवीं की सामाजिक विज्ञान की किताब में एक बड़ा बदलाव किया है। इस नई किताब से भारतीय संविधान की प्रस्तावना यानी वह मुख्य पन्ना जिसमें देश के मूल विचार लिखे होते हैं, उसे हटा दिया गया है। इसके साथ ही किताब में देश की संप्रभुता, समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे महत्वपूर्ण शब्दों का भी इस बार विस्तार से कोई जिक्र नहीं किया गया है। इसकी जगह नई किताब में साल 1975 में देश में लगी इमरजेंसी यानी आपातकाल को लेकर एक पूरा नया खंड जोड़ा गया है। गुरुवार को यह जानकारी सामने आने के बाद से ही इस पर चर्चा शुरू हो गई है।

लोकतंत्र के सामने आई सबसे बड़ी चुनौती थी इमरजेंसी

किताब के समाज को समझने से जुड़े एक विशेष अध्याय में आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र के सामने आई अब तक की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बताया गया है। इसमें लिखा गया है कि 1970 के दशक की शुरुआत में देश की तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ बेरोजगारी और महंगाई को लेकर लोगों में काफी गुस्सा था। इसी नाराजगी के बाद जून 1975 में देश में राष्ट्रीय आपातकाल लागू किया गया था। इस नए अध्याय में लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भूमिका को बहुत विस्तार से समझाया गया है। इसमें बताया गया है कि कैसे उन्होंने छात्रों और आम लोगों को साथ मिलाकर बिहार और गुजरात में बड़े जन आंदोलन खड़े किए थे।

मौलिक अधिकार छीने गए और नेताओं को जेल में डाला, 1977 के चुनाव को बताया लोकतंत्र की ताकत

नई पुस्तक में आपातकाल के उस दौर की कड़वी सच्चाइयों को भी शामिल किया गया है। इसमें लिखा गया है कि इमरजेंसी के दौरान नागरिकों के अधिकांश मौलिक अधिकार यानी जीने और अपनी बात कहने की आजादी को रोक दिया गया था। अखबारों पर सरकारी नियंत्रण लगा दिया गया था और कई बड़े राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया था। हालांकि, किताब में यह भी साफ किया गया है कि 1977 में जब इमरजेंसी खत्म हुई, तो देश की जनता ने वोट की ताकत से तत्कालीन सरकार को हरा दिया। किताब में इसे भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी मजबूती का उदाहरण माना गया है।

संविधान की प्रस्तावना से जुड़े इन भारी-भरकम शब्दों का आम भाषा में समझिए असली मतलब

इस नई किताब में भले ही कुछ जरूरी शब्दों को विस्तार से नहीं समझाया गया है, लेकिन आम पाठकों के लिए इन्हें जानना बेहद जरूरी है। संविधान में सॉवरेन यानी संप्रभुता का मतलब है कि हमारा भारत देश पूरी तरह आजाद है और अपने फैसले खुद लेता है। सोशलिस्ट यानी समाजवाद का अर्थ है समाज में अमीर-गरीब की खाई को कम करके सबको तरक्की के समान मौके देना। सेक्युलर यानी धर्मनिरपेक्ष का सीधा मतलब है कि सरकार की नजर में सभी धर्म बराबर हैं और देश का अपना कोई एक सरकारी धर्म नहीं है। इसी तरह डेमोक्रेटिक का मतलब जनता द्वारा वोट देकर अपनी सरकार चुनना और रिपब्लिक का मतलब देश का मुखिया चुनाव के जरिए तय होना है, न कि किसी राजा का बेटा राजा बनना।
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