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पीएम मोदी पहुंचे इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर
पीएम मोदी पहुंचे इंडोनेशिया के प्रम्बानन मंदिर
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सांस्कृतिक विरासत : इंडोनेशिया के 1000 साल पुराने प्रम्बानन मंदिर पहुंचे पीएम मोदी, की पूजा-अर्चना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडोनेशिया दौरे के आखिरी दिन करीब 1000 साल पुराने ऐतिहासिक प्रम्बानन हिंदू मंदिर में पूजा-अर्चना की। यह दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। इस दौरान भारत और इंडोनेशिया के बीच इस प्राचीन धरोहर के संरक्षण और मरम्मत को लेकर एक बड़ा समझौता भी हुआ, जिससे दोनों देशों के सांस्कृतिक रिश्ते और मजबूत होंगे।

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प्रकाशित: 08 Jul 2026, 01:38 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी तीन दिनों की इंडोनेशिया यात्रा के आखिरी दिन बुधवार को ऐतिहासिक प्रम्बानन मंदिर पहुंचे। भारत और इंडोनेशिया के पुराने सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करने के लिए यह दौरा बेहद खास माना जा रहा है। 

पीएम मोदी ने इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो के साथ इस करीब 1000 साल पुराने हिंदू मंदिर का दीदार किया और वहां पूजा-अर्चना भी की। यह विशाल मंदिर त्रिमूर्ति यानी भगवान शिव, भगवान विष्णु और भगवान ब्रह्मा को समर्पित है। इस यात्रा के दौरान पीएम मोदी ने हेलीकॉप्टर से इस बेहद खूबसूरत मंदिर की एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर साझा की।

भारत और इंडोनेशिया मिलकर करेंगे मंदिर का जीर्णोद्धार

पीएम मोदी के इस दौरे से एक दिन पहले भारत और इंडोनेशिया के बीच एक बड़ा समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत दोनों देश मिलकर इस ऐतिहासिक मंदिर परिसर की देखरेख और मरम्मत का काम करेंगे। भारत अपनी पूर्व की ओर देखो नीति के तहत इस ऐतिहासिक विरासत को सहेजने में इंडोनेशिया का साथ देगा। दोनों देशों का मानना है कि इस कदम से उनके आपसी संबंध और ज्यादा मजबूत होंगे।

दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर

यह मंदिर अपनी अद्भुत खूबसूरती, समृद्ध इतिहास और विशाल बनावट के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। यह इंडोनेशिया का सबसे बड़ा और कंबोडिया के अंगकोर वाट के बाद पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया का दूसरा सबसे बड़ा हिंदू मंदिर परिसर है। लगभग 40 हेक्टेयर के बड़े इलाके में फैले इस परिसर के बीच में तीन बड़े और ऊंचे मंदिर बने हैं। इनमें भगवान शिव का मंदिर सबसे मुख्य और 47 मीटर ऊंचा है। इस मंदिर की दीवारों पर की गई नक्काशी में रामायण और दूसरे हिंदू धर्मग्रंथों की कहानियां चित्रों के जरिए दिखाई गई हैं, जो यह बताती हैं कि पुराने समय में भारतीय संस्कृति कितनी दूर तक फैली थी।

ज्वालामुखी और भूकंप के बाद भी बचा रहा इतिहास

इस मंदिर का इतिहास 9वीं शताब्दी से जुड़ा है। मताराम राजवंश के राजा रकाई पिकातन ने इसे बनवाना शुरू किया था और तब इस पूरे परिसर में करीब 240 छोटे-बड़े मंदिर हुआ करते थे। समय के साथ आए राजनीतिक बदलावों और पास के माउंट मेरापी ज्वालामुखी के फटने के कारण 10वीं शताब्दी में यह जगह सूनी हो गई थी। बाद में आए भूकंप से भी इसे काफी नुकसान पहुंचा। इसके बाद 19वीं और 20वीं शताब्दी में इसे दोबारा ठीक किया गया। साल 1991 में दुनिया की ऐतिहासिक इमारतों की सुरक्षा करने वाली संस्था यूनेस्को ने इसे विश्व धरोहर घोषित किया था।

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