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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, शादी से इनकार हर बार दुष्कर्म नहीं

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अहम फैसले में कहा है कि लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले वयस्कों के बीच बने शारीरिक संबंध सामान्यतः सहमति पर आधारित माने जाएंगे। केवल बाद में शादी से इनकार करने के आधार पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 01 Jul 2026, 10:36 AM · अपडेट: 06 Jul 2026, 06:10 AM
बिलासपुर
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि लंबे समय तक सहमति से साथ रह रहे वयस्कों के बीच बने शारीरिक संबंधों को केवल इसलिए दुष्कर्म नहीं माना जा सकता क्योंकि बाद में किसी एक पक्ष ने शादी करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में पूरे संबंध की प्रकृति, उसकी अवधि और दोनों पक्षों के व्यवहार को ध्यान में रखकर ही निर्णय लिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति संजय एस. अग्रवाल और न्यायमूर्ति नरेंद्र कुमार व्यास की खंडपीठ ने यह फैसला एक महिला द्वारा दायर अपील पर सुनाया। महिला ने निचली अदालत द्वारा आरोपी को बरी किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी।

लंबे समय तक साथ रहने को माना सहमति का संकेत 

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हैं, तो सामान्य रूप से यह माना जाएगा कि उनके बीच बने शारीरिक संबंध आपसी सहमति से थे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संबंध के दौरान शादी की इच्छा या भविष्य में विवाह की चर्चा होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि शारीरिक संबंध केवल शादी के वादे के आधार पर बनाए गए थे। कोर्ट ने यह भी कहा कि आज के समय में महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक स्थिति पहले से अधिक मजबूत हुई है। ऐसे में न्यायालयों को केवल पारंपरिक सोच के आधार पर नहीं, बल्कि पूरे घटनाक्रम और दोनों पक्षों के आचरण को ध्यान में रखते हुए मामलों का मूल्यांकन करना चाहिए।

क्या था मामला 

मामले में शिकायतकर्ता 40 वर्षीय महिला भिलाई नगर निगम में परियोजना प्रबंधक के पद पर कार्यरत हैं। महिला ने बताया कि वर्ष 2019 में आईआईएम रायपुर में एमबीए की पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात आरोपी से हुई थी। आरोप के अनुसार, शादी का भरोसा मिलने के बाद दोनों के बीच संबंध बने और वे करीब दो वर्षों तक साथ रहे। महिला का कहना था कि पढ़ाई पूरी होने के बाद आरोपी शादी की बात टालने लगा और बाद में यह कहते हुए पीछे हट गया कि उसके परिवार वाले विवाह के पक्ष में नहीं हैं। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि नवंबर 2021 में आरोपी ने उसकी इच्छा के विरुद्ध अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए। इसके बाद दिसंबर 2022 में भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 377 के तहत मामला दर्ज कराया गया। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को बरी कर दिया था। अदालत का कहना था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में सफल नहीं हुआ।

हाईकोर्ट ने किन तथ्यों पर दिया जोर 

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि महिला ने जिरह में स्वीकार किया था कि वह महिला आयोग के समक्ष 30 लाख रुपये लेकर विवाद समाप्त करने के लिए तैयार थी। रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि आरोपी ने समझौते के तहत 15 लाख रुपये का चेक दिया था, लेकिन समझौता नहीं होने पर उसका भुगतान रोक दिया गया। अदालत ने यह भी नोट किया कि दोनों पक्षों के बीच यह सहमति थी कि परिवारों की मंजूरी मिलने के बाद ही विवाह किया जाएगा। महिला के भाई ने भी अपनी गवाही में कहा कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और उसी के कारण उनके बीच शारीरिक संबंध बने।

मेडिकल रिपोर्ट भी बनी अहम आधार 

हाईकोर्ट ने महिला का मेडिकल परीक्षण करने वाले डॉक्टर की गवाही को भी महत्वपूर्ण माना। डॉक्टर ने बताया कि जांच के दौरान महिला ने जबरन या अप्राकृतिक यौन संबंध की कोई शिकायत नहीं की थी। मेडिकल जांच में भी ऐसी कोई चोट नहीं मिली, जिससे जबरदस्ती या अप्राकृतिक यौन संबंध की पुष्टि हो सके। इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने माना कि दोनों के बीच संबंध सहमति से था और केवल शादी नहीं होने के आधार पर इसे दुष्कर्म का मामला नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यह निष्कर्ष सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित कानूनी सिद्धांतों के अनुरूप है। इसी आधार पर आरोपी की रिहाई को बरकरार रखते हुए महिला की अपील खारिज कर दी।
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