डॉ. शिव डहरिया ने कहा कि नकटी गांव के लोगों को वर्षों से बिजली कनेक्शन, पेयजल सुविधा, सड़क, राशन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र और अन्य कई सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता रहा। ऐसे में अब अचानक उसी बस्ती को अवैध घोषित कर लोगों को बेदखल करना कई गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने कहा कि चुनाव के समय इन्हीं लोगों के वोट पूरी तरह वैध माने गए, लेकिन आज उनके घरों को अवैध बताकर तोड़ा जा रहा है। यदि शासन-प्रशासन स्वयं इतने वर्षों तक इस बस्ती को मान्यता देता रहा, तो अब गरीब परिवारों को अतिक्रमणकारी घोषित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि विधायक कॉलोनी बनाने के नाम पर गरीबों के आशियाने उजाड़े जा रहे हैं, जबकि सरकार को पहले उनके अधिकारों और सम्मानजनक पुनर्वास की चिंता करनी चाहिए।
'पहले पुनर्वास, फिर बुलडोजर चलाना चाहिए था'
डॉ. डहरिया ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक सरकार का पहला दायित्व प्रभावित परिवारों के पुनर्वास की व्यवस्था करना होता है। उनका आरोप है कि यहां पहले बुलडोजर चलाया गया और बाद में पुनर्वास की बात कही जा रही है, जो पूरी तरह संवेदनहीन और दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन वास्तव में प्रभावित परिवारों के हितों को लेकर गंभीर होता, तो पहले प्रत्येक परिवार को वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराया जाता और उसके बाद ही बेदखली की कार्रवाई की जाती। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को खुले आसमान के नीचे रहने के लिए मजबूर करना किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील प्रशासन के लिए उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि विकास परियोजनाओं के साथ मानवीय दृष्टिकोण अपनाना भी सरकार की जिम्मेदारी है।
सरकार से मांगा जवाब, बेदखली रोकने की मांग
डॉ. डहरिया ने सरकार से यह भी पूछा कि यदि नकटी गांव को अवैध माना जा रहा है, तो वहां वर्षों तक सरकारी योजनाओं का लाभ कैसे पहुंचता रहा। प्रधानमंत्री आवास योजना की किस्तें किस आधार पर जारी हुईं, बिजली के खंभे क्यों लगाए गए और राशन कार्ड व मतदाता सूची में लोगों के नाम कैसे दर्ज किए गए। उन्होंने कहा कि सरकार को इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब प्रदेश की जनता के सामने रखना चाहिए। साथ ही उन्होंने मांग की कि नकटी गांव में चल रही बेदखली की कार्रवाई तत्काल रोकी जाए, सभी प्रभावित परिवारों का सम्मानजनक पुनर्वास सुनिश्चित किया जाए तथा पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जाए। उनका कहना है कि गरीबों के सिर से छत छीनकर जनप्रतिनिधियों के लिए कॉलोनी बनाना सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।