वैश्विक युद्धों के बदलते ढर्रे और आधुनिक तकनीक की बढ़ती भूमिका को देखते हुए भारतीय सशस्त्र सेनाएं (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) खुद को तेजी से अपग्रेड कर रही हैं। इसी कड़ी में भारत सरकार अपनी मिलिट्री के इतिहास की अब तक की सबसे बड़ी स्वदेशी ड्रोन खरीदारी को अंतिम रूप देने में जुटी है। इस महा-सौदे की सबसे खास बात यह है कि ये सभी अत्याधुनिक ड्रोन पूरी तरह भारतीय डिफेंस कंपनियों से खरीदे जाएंगे, जिससे रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' अभियान को एक नई ताकत मिलेगी।
क्यों पड़ी इतने बड़े ड्रोन आधुनिकीकरण की जरूरत?
हालिया वैश्विक संघर्षों ने युद्ध के तौर-तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। रक्षा मंत्रालय ने आधुनिक युद्धों से बड़े सबक सीखे हैं:
वैश्विक युद्धों का सबक: रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व में ईरान-इजरायल के बीच हुए हालिया संघर्षों ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन ही 'गेम चेंजर' साबित होंगे। कम लागत वाले सुसाइड ड्रोन और सर्विलांस ड्रोन ने महंगे डिफेंस सिस्टम्स को भी छकाया है।
ऑपरेशन सिंदूर का प्रभाव: भारतीय सीमाओं पर हुए 'ऑपरेशन सिंदूर' और अन्य खुफिया ऑपरेशन्स के बाद से ही रक्षा मंत्रालय ने सेनाओं में ड्रोन टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को सर्वोच्च प्राथमिकता पर रखा है।
₹20,000 करोड़ की 'मेगा डील' की बड़ी बातें
भारत सरकार इस साल घरेलू कंपनियों को करीब 2 बिलियन डॉलर (लगभग ₹20,000 करोड़ रुपये) के ड्रोन ऑर्डर देने की प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ा रही है। यह सौदा भारतीय सेनाओं को किसी भी आपातकालीन स्थिति के लिए 24x7 तैयार रखने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है।
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| कुल बजट | लगभग ₹20,000 करोड़ (2 बिलियन डॉलर) |
| प्रक्रिया | फास्ट-ट्रैक (Fast-Track) खरीद प्रक्रिया |
| समय सीमा | 18 से 24 महीनों के भीतर डिलीवरी शुरू |
| फोकस | पूर्णतः स्वदेशी (Made in India) ड्रोन |
फास्ट-ट्रैक मोड पर होगी खरीद: अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, सीमाओं पर मौजूदा सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए सरकार इस डील के लिए फास्ट-ट्रैक रूट अपना सकती है, ताकि लालफीताशाही से बचकर सेनाओं को जल्द से जल्द ये हथियार सौंपे जा सकें।
टैक्टिकल से लेकर लॉजिस्टिक्स ड्रोन तक शामिल
यह सौदा हाल ही में हुए करीब ₹3,000 करोड़ के टैक्टिकल-क्लास ड्रोन के मुकाबले कई गुना बड़ा है। इसके तहत सेनाओं को अलग-अलग श्रेणियों के ड्रोन मिलेंगे:
लॉन्ग-एंड्योरेंस सर्विलांस ड्रोन: जो सीमाओं पर लगातार कई घंटों तक उड़ान भरकर दुश्मनों की हर हरकत पर नजर रख सकेंगे।
लॉजिस्टिक्स और कार्गो ड्रोन: सियाचिन और लद्दाख जैसे दुर्गम व अत्यधिक ऊंचाई वाले इलाकों में तैनात सैनिकों तक राशन, दवाइयां और गोला-बारूद पहुंचाने के काम आएंगे।
कमिकेज (सुसाइड) ड्रोन: जो दुश्मन के बंकरों और ठिकानों को खुद से टकराकर तबाह करने की क्षमता रखते हैं।
भारतीय डिफेंस स्टार्टअप्स के लिए 'गोल्डन एरा'
इस ऐतिहासिक सौदे से देश के भीतर ही डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम को जबरदस्त बढ़ावा मिलने वाला है। अडानी डिफेंस, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स, आइडियाफोर्ज और कई अन्य उभरते हुए घरेलू ड्रोन स्टार्टअप्स को इस डील से बड़े ऑर्डर्स मिलने की उम्मीद है। इससे न केवल देश का पैसा देश में रहेगा, बल्कि भारत आने वाले समय में ग्लोबल ड्रोन हब बनने की दिशा में भी मजबूत कदम बढ़ाएगा।
सेना के सूत्रों का कहना है कि अगले 18 से 24 महीनों के भीतर इन अनमैन्ड एरियल व्हीकल्स (UAV) की खेप सेना के बेड़े में शामिल होना शुरू हो जाएगी, जो भारतीय सीमाओं (एलओसी और एलएसी) की सुरक्षा को अभेद्य बना देगी।
