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भारत और दक्षिण कोरिया अब केवल आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी
भारत और दक्षिण कोरिया अब केवल आर्थिक और व्यापारिक साझेदारी
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भारत-दक्षिण कोरिया :  रक्षा साझेदारी का नया अध्याय, अगली पीढ़ी के हथियारों पर साथ काम करेंगे दोनों देश

भारत और दक्षिण कोरिया ने रक्षा सहयोग को नई रणनीतिक दिशा देने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। रक्षा मंत्री Rajnath Singh के सियोल दौरे के दौरान दोनों देशों के बीच लेजर हथियार, गाइडेड एनर्जी वेपन्स, मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम और एडवांस सैन्य तकनीकों के संयुक्त विकास व उत्पादन को लेकर महत्वपूर्ण समझौते हुए। विशेषज्ञ इसे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की सामरिक राजनीति के लिहाज से बेहद अहम मान रहे हैं।

प्रकाशित: 21 May 2026, 06:01 PM · अपडेट: 16 Sep 2026, 10:42 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
भारत और दक्षिण कोरिया अब केवल आर्थिक और व्यापारिक साझेदार नहीं रहना चाहते, बल्कि दोनों देश रक्षा तकनीक और भविष्य की सैन्य क्षमताओं में भी एक-दूसरे के रणनीतिक सहयोगी बनने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। दक्षिण कोरिया की राजधानी सियोल में हुई उच्चस्तरीय बैठकों ने साफ संकेत दिया है कि आने वाले वर्षों में भारत और दक्षिण कोरिया रक्षा क्षेत्र में नई साझेदारी का मजबूत ढांचा तैयार कर सकते हैं। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह  की द्विपक्षीय यात्रा के दौरान भारतीय रक्षा कंपनी लार्सन एंड टुब्रो और दक्षिण कोरिया की रक्षा कंपनियों तथा संस्थानों के बीच कई महत्वपूर्ण तकनीकी सहयोग समझौतों पर सहमति बनी। इन समझौतों में भविष्य के युद्धों के लिए अत्याधुनिक हथियार प्रणाली विकसित करने पर जोर दिया गया है।

भविष्य के युद्धों की तैयारी 

सूत्रों के अनुसार भारत और दक्षिण कोरिया जिन तकनीकों पर मिलकर काम करने की तैयारी कर रहे हैं, उनमें गाइडेड एनर्जी वेपन्स यानी लेजर आधारित हथियार प्रणाली सबसे महत्वपूर्ण मानी जा रही है। दुनिया भर में बदलते युद्ध स्वरूप को देखते हुए लेजर हथियारों को भविष्य की रक्षा रणनीति का बड़ा हिस्सा माना जा रहा है। आने वाले समय में ड्रोन स्वॉर्म अटैक, हाई-स्पीड मिसाइलें और लो-फ्लाइंग एयर थ्रेट्स सबसे बड़ी चुनौती बन सकते हैं। ऐसे में लेजर हथियार कम लागत, तेज प्रतिक्रिया और सटीक निशाने की वजह से बेहद प्रभावी माने जाते हैं। भारत पहले से ही स्वदेशी लेजर तकनीकों पर काम कर रहा है, जबकि दक्षिण कोरिया इलेक्ट्रॉनिक डिफेंस और स्मार्ट एयर डिफेंस प्लेटफॉर्म के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों का यह सहयोग तकनीकी दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम 

बैठक में मोबाइल ऑटोमेटिक एयर डिफेंस सिस्टम के संयुक्त विकास पर भी चर्चा हुई। आधुनिक युद्धों में मोबाइल एयर डिफेंस सिस्टम की भूमिका लगातार बढ़ रही है, क्योंकि युद्धक्षेत्र तेजी से बदलता है और स्थिर रक्षा प्रणाली कई बार कमजोर साबित हो सकती है। सूत्रों के मुताबिक दोनों देश ऐसे सिस्टम विकसित करने की दिशा में काम कर सकते हैं जो कम समय में तैनात किए जा सकें और ड्रोन, क्रूज मिसाइल तथा अन्य हवाई खतरों को तुरंत निष्क्रिय कर सकें।  यदि यह परियोजना सफल होती है, तो भारतीय सेना, वायुसेना और नौसेना को भविष्य में अत्याधुनिक एयर डिफेंस क्षमता मिल सकती है।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 

सियोल में आयोजित वार्ता के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा कि भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापारिक और औद्योगिक सहयोग पहले से मजबूत रहा है, लेकिन अब दोनों देशों को रक्षा तकनीक के क्षेत्र में भी साझेदारी को नई ऊंचाई तक ले जाना चाहिए।उन्होंने कहा “कोरिया की तकनीकी उत्कृष्टता, भारत की प्रतिभा, बड़े पैमाने की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और इनोवेशन इकोसिस्टम मिलकर एडवांस रक्षा प्रणालियों के विकास के लिए मजबूत आधार तैयार करते हैं।” राजनाथ सिंह ने यह भी कहा कि भारत आत्मनिर्भर रक्षा उत्पादन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है और ऐसे सहयोग भविष्य में दोनों देशों के लिए लाभदायक साबित होंगे।

समुद्री सुरक्षा और इंडो-पैसिफिक रणनीति 

दक्षिण कोरिया के रक्षा मंत्री आन ग्यू-बैक के साथ हुई बैठक में हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति और समुद्री सहयोग पर भी विस्तृत चर्चा हुई। भारत और दक्षिण कोरिया दोनों ही इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में स्थिरता और सुरक्षित समुद्री मार्गों को बेहद महत्वपूर्ण मानते हैं। दक्षिण चीन सागर से लेकर हिंद महासागर तक बढ़ती सामरिक प्रतिस्पर्धा के बीच दोनों देशों की साझेदारी को रणनीतिक नजरिए से अहम माना जा रहा है। सूत्रों के अनुसार दोनों देशों ने नौसैनिक सहयोग, समुद्री निगरानी, सप्लाई चेन सुरक्षा और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में भी सहयोग बढ़ाने पर विचार किया।

भारत की रक्षा में आत्मनिर्भरता 

यह सहयोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ नीति को नई ताकत दे सकता है। यदि भारत और दक्षिण कोरिया संयुक्त उत्पादन मॉडल पर आगे बढ़ते हैं, तो भारत में अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों का निर्माण बढ़ सकता है। इससे न केवल विदेशी आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि भारत वैश्विक रक्षा निर्यात बाजार में भी मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है। भारतीय कंपनियों को दक्षिण कोरिया की हाई-टेक रक्षा तकनीकों तक पहुंच मिलने से घरेलू रक्षा उद्योग को नई गति मिल सकती है। इससे इंजीनियरिंग, रिसर्च और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में रोजगार के नए अवसर भी पैदा हो सकते हैं।

चीन और एशियाई सुरक्षा 

 भारत और दक्षिण कोरिया का यह सहयोग केवल तकनीकी समझौता नहीं बल्कि बदलते भू-राजनीतिक हालात का भी संकेत है। एशिया में चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियां, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शक्ति संतुलन और आधुनिक सैन्य प्रतिस्पर्धा के दौर में भारत और दक्षिण कोरिया दोनों अपनी सुरक्षा साझेदारी मजबूत करना चाहते हैं। दक्षिण कोरिया जहां उत्तर कोरिया और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है, वहीं भारत भी चीन और पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं के बीच अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने में जुटा है। ऐसे में दोनों देशों का सहयोग सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

भारतीय रक्षा उद्योग के लिए नए रास्ते

भारतीय रक्षा क्षेत्र में निजी कंपनियों की भागीदारी तेजी से बढ़ रही है। लार्सन एंड टुब्रो जैसी कंपनियां पहले से मिसाइल सिस्टम, नौसैनिक प्लेटफॉर्म और एडवांस इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट्स पर काम कर रही हैं। दक्षिण कोरिया के साथ साझेदारी भारतीय निजी रक्षा उद्योग को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिला सकती है। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में भारत संयुक्त अनुसंधान, तकनीकी हस्तांतरण और सह-उत्पादन मॉडल के जरिए नई सैन्य तकनीकों का बड़ा केंद्र बन सकता है।

भविष्य की रणनीतिक साझेदारी 

भारत और दक्षिण कोरिया के बीच यह रक्षा सहयोग केवल वर्तमान जरूरतों तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे भविष्य की रणनीतिक साझेदारी की मजबूत नींव के रूप में देखा जा रहा है। लेजर हथियार, एडवांस एयर डिफेंस सिस्टम, साइबर सुरक्षा और समुद्री रणनीति जैसे क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग आने वाले वर्षों में एशिया की सुरक्षा राजनीति को भी प्रभावित कर सकता है। यदि दोनों देश इस सहयोग को योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ाते हैं, तो यह साझेदारी एशिया में आधुनिक रक्षा तकनीक और सैन्य नवाचार का नया मॉडल बन सकती है।
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