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Jagannath Rath Yatra 2026
Jagannath Rath Yatra 2026
धर्म

Jagannath Rath Yatra : यात्रा शुरू होने से पहले जानें इसकी प्रमुख परंपराएं

16 जुलाई 2026 को निकलने वाली भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आस्था और परंपरा का भव्य उत्सव है। रथ निर्माण, छेरा पहरा, गुंडिचा मार्जन, बहुड़ा यात्रा और तीनों रथों के धार्मिक महत्व को जानकर श्रद्धालु इस यात्रा का महत्व और बेहतर ढंग से समझ सकते हैं।

कीर्तिमान डेस्क
प्रकाशित: 27 Jun 2026, 04:48 PM · अपडेट: 03 Nov 2026, 03:48 PM
जगन्नाथ
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और परंपरा का अनूठा संगम मानी जाती है। वर्ष 2026 में यह पावन यात्रा 16 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन निकाली जाएगी। इस दौरान लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचकर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन करते हैं तथा रथ खींचने का सौभाग्य प्राप्त करते हैं। रथ यात्रा से पहले और उसके दौरान कई विशेष धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, जिनका पालन सदियों से किया जा रहा है। आइए जानते हैं इन प्रमुख परंपराओं के बारे में।

बिना कील के तैयार होते हैं तीनों भव्य रथ

रथ यात्रा के लिए भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के तीन अलग-अलग रथ बनाए जाते हैं। इनका निर्माण विशेष रूप से नीम की लकड़ी से किया जाता है और पारंपरिक मान्यता के अनुसार इनमें लोहे की कीलों या धातु का उपयोग नहीं होता।
तालध्वज – भगवान बलभद्र का रथ (लाल-हरा) 
दर्पदलन – देवी सुभद्रा का रथ (काला/नीला-लाल) 
नंदीघोष – भगवान जगन्नाथ का रथ (लाल-पीला)
स्नान के बाद 'अनसर' काल में रहते हैं भगवान 
रथ यात्रा से लगभग 15 दिन पहले भगवान का 108 कलशों के जल से विशेष स्नान कराया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसके बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं और 'अनसर' या 'ओसर घर' में विश्राम करते हैं। स्वस्थ होने के बाद वे 'नवयौवन दर्शन' के माध्यम से पहली बार भक्तों को दर्शन देते हैं।
छेरा पहरा की अनोखी परंपरा 
रथ यात्रा शुरू होने से पहले पुरी के गजपति महाराज स्वयं स्वर्ण झाड़ू से रथ और मार्ग की सफाई करते हैं। इसे छेरा पहरा कहा जाता है। यह परंपरा इस संदेश का प्रतीक है कि भगवान के सामने सभी समान हैं।
गुंडिचा मंदिर की विशेष सफाई 
यात्रा से एक दिन पहले श्रद्धालु पवित्र जल से गुंडिचा मंदिर की सफाई करते हैं। इस परंपरा को गुंडिचा मार्जन कहा जाता है और इसे भगवान के स्वागत की तैयारी माना जाता है।
ढोल-नगाड़ों के बीच शुरू होती है रथ यात्रा 
आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के दिन भव्य रथ यात्रा का शुभारंभ होता है। सबसे पहले भगवान बलभद्र का रथ, फिर देवी सुभद्रा और अंत में भगवान जगन्नाथ का रथ आगे बढ़ता है। लाखों श्रद्धालु रस्सियों से रथ खींचते हैं, जिसे अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। 
रथ खींचने का धार्मिक महत्व
जगन्नाथ रथ यात्रा की सबसे विशेष बात यह है कि इसमें जाति, धर्म या देश का कोई भेदभाव नहीं होता। कोई भी श्रद्धालु भगवान के रथ की रस्सी खींच सकता है। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और विश्वास के साथ रथ खींचने वाले भक्त को सौ यज्ञों के बराबर पुण्य प्राप्त होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है।

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