जिले के विकासखंड पिथौरा अंतर्गत ग्राम कौहाकुंडा के प्रगतिशील कृषक रूक्मण नायक ने अपनी 7 एकड़ कृषि भूमि में तथा विकासखंड बसना के ग्राम भौंरादादर के कृषक गोकुल पटेल ने अपने खेत में ढैंचा हरी खाद फसल की बुवाई कर भूमि की उर्वरता बढ़ाने की दिशा में सार्थक कदम उठाया है।
रासायनिक उर्वरकों पर बढ़ती निर्भरता तथा मिट्टी की घटती गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए दोनों किसानों ने कृषि विभाग के मार्गदर्शन में हरी खाद तकनीक को अपनाया। रूक्मण नायक ने बताया कि उन्होंने अपने खेत में ढैंचा की बुवाई की है, जिसे उपयुक्त अवस्था में खेत में पलटकर मिट्टी में मिलाया जाएगा। इस प्रक्रिया से मिट्टी में जैविक पदार्थों की मात्रा बढ़ती है तथा प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन की उपलब्धता में वृद्धि होती है।
कम लागत में पोषक तत्वों की बढ़ाेतरी
गोकुल पटेल ने बताया कि हरी खाद के उपयोग से भूमि में सूक्ष्म पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ती है। इसके साथ ही रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता कम होने की संभावना रहती है, जिससे खेती की लागत में भी कमी आएगी। उप संचालक कृषि एफ.आर. कश्यप ने बताया कि हरी खाद ऐसी फसलें हैं जिन्हें विशेष रूप से मिट्टी की उर्वरता और संरचना को बढ़ाने तथा बनाए रखने के लिए उगाया जाता है। इन्हें सीधे खेत में पलटकर या खाद तैयार करने के बाद पुनः मिट्टी में मिलाया जाता है। हरी खाद के लिए सन, ढैंचा, लोबिया, उड़द, मूंग और ग्वार जैसी दलहनी फसलों का उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इन फसलों की वृद्धि तेज होती है, इनकी पत्तियाँ अधिक संख्या में एवं वजनदार होती हैं तथा इन्हें कम उर्वरक और कम पानी की आवश्यकता होती है। इससे कम लागत में अधिक मात्रा में कार्बनिक पदार्थ प्राप्त होता है। बोआई के 35 से 40 दिनों के भीतर, फूल आने से पहले फसल को खेत में पलटने पर प्रति हेक्टेयर लगभग 50 से 60 किलोग्राम नाइट्रोजन मिट्टी को प्राप्त होती है।हरी खाद से बढ़ी मिट्टी की उर्वरता
हरी खाद के नियमित उपयोग से मिट्टी भुरभुरी बनती है, वायु संचार और जलधारण क्षमता में सुधार होता है। इसके साथ ही अम्लीयता और क्षारीयता का संतुलन बेहतर होता है तथा मृदा क्षरण भी कम होता है। हरी खाद से मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या और उनकी सक्रियता बढ़ती है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति एवं फसल उत्पादन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि होती है।