अक्सर ऐसा होता है कि कोई पुरानी बात एक पल में याद आ जाती है, लेकिन वही याद कुछ देर बाद लाख कोशिश करने पर भी दिमाग में नहीं आती। दिलचस्प बात यह है कि याददाश्त खत्म नहीं होती, फिर भी उसे याद करना आसान या मुश्किल हो जाता है। हाल ही में प्रकाशित एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिमाग में मौजूद हिस्टामिन न्यूरॉन्स की गतिविधि यह तय करने में अहम भूमिका निभाती है किसी विशेष समय पर कोई याद कितनी आसानी से सामने आएगी। शोध के नतीजे बताते हैं कि यादों का मौजूद होना और उन्हें तुरंत याद कर पाना, दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।
यादें मौजूद हैं, लेकिन हर समय उपलब्ध नहीं होतीं
शोधकर्ताओं के अनुसार किसी व्यक्ति या जीव के दिमाग में संग्रहीत यादें हमेशा नष्ट नहीं होती, लेकिन उसे बाहर निकालने की क्षमता समय-समय पर बदल सकती है यही कारण है कि कई बार कोई नाम, घटना या जानकारी अचानक याद आ जाती है और कुछ मिनट पहले तक वही बात याद नहीं आ रही होती अध्ययन में पाया गया कि दिमाग में होने वाले कुछ धीमे और स्वाभाविक बदलाव इस प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं। खासतौर पर हिस्टामिन न्यूरॉन्स की सक्रियता यादों तक पहुंच बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
अध्ययन में सामने आए दिलचस्प परिणाम
इस शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने चूहों के व्यवहार और उनके मस्तिष्क की गतिविधियों का एनालिसेस किया प्रयोगों में देखा गया कि जब किसी याद से जुड़ा संकेत दिए जाने से ठीक पहले हिस्टामिन न्यूरॉन्स अधिक सक्रिय थे, तब चूहे सीखी हुई जानकारी को बेहतर तरीके से याद कर पा रहे थे वहीं जब इन न्यूरॉन्स की गतिविधि कम थी, तब वही संकेत उतना प्रभावी नहीं रहा और याद को सामने लाने की संभावना भी घट गई शोधकर्ताओं का कहना है कि इससे संकेत मिलता है कि यादों तक पहुंच बनाने की क्षमता दिमाग की तत्काल अवस्था पर निर्भर कर सकती है।
हिस्टामिन न्यूरॉन्स
हिस्टामिन को आमतौर पर एलर्जी और प्रतिरक्षा प्रणाली से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन यह दिमाग में एक महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटर के रूप में भी काम करता है। यह जागरूकता, ध्यान, नींद और मानसिक सतर्कता जैसी प्रक्रियाओं से जुड़ा हुआ है रिसर्च बताती है कि इसकी भूमिका केवल सतर्कता तक सीमित नहीं हो सकती, बल्कि यह यादों को सक्रिय करने की प्रक्रिया से भी जुड़ी हो सकती है।
अल्जाइमर और भूलने की बीमारी
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज भविष्य में अल्जाइमर, डिमेंशिया और अन्य स्मृति संबंधी समस्याओं को समझने में मदद कर सकती है। कई मामलों में मरीजों की यादें पूरी तरह खत्म नहीं होतीं, बल्कि उन्हें जरूरत के समय याद करने में कठिनाई होती है यदि यह समझा जा सके कि दिमाग में कौन-सी प्रक्रिया यादों तक पहुंच को नियंत्रित करती है, तो भविष्य में ऐसे उपचार विकसित किए जा सकते हैं जो स्मृति को बेहतर बनाने में मदद करें।
दिमाग हर पल बदलता रहता है
यह अध्ययन इस विचार को भी बताता है कि हमारा मस्तिष्क एक स्थिर प्रणाली नहीं है दिमाग में लगातार सूक्ष्म बदलाव होते रहते हैं और यही बदलाव हमारी सोच, ध्यान, निर्णय और याददाश्त को प्रभावित करते हैं। पहले के कई शोध भी संकेत दे चुके हैं कि यादों का प्रतिनिधित्व करने वाले न्यूरॉन्स समय के साथ बदल सकते हैं और मस्तिष्क की सक्रियता लगातार गतिशील बनी रहती है।
क्या कहती है खोज
इस अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि भूलना हमेशा याददाश्त के कमजोर होने का संकेत नहीं होता। कई बार याद दिमाग में सुरक्षित रहती है, लेकिन उस तक पहुंचने का रास्ता अस्थायी रूप से कम सक्रिय हो जाता है। हिस्टामिन न्यूरॉन्स की गतिविधि इस रास्ते को खोलने या सीमित करने में भूमिका निभा सकती है यानी अगली बार यदि कोई बात तुरंत याद न आए, तो जरूरी नहीं कि वह भूल गई हो। संभव है कि आपका दिमाग उस समय उस जानकारी तक पहुंच बनाने के लिए सही अवस्था में न हो।