आधुनिक युद्धक्षेत्र की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। यूक्रेन युद्ध ने यह साबित कर दिया है कि आसमान में मंडराते सस्ते आत्मघाती ड्रोन (Kamikaze Drones) और एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें (ATGM) करोड़ों डॉलर के भारी-भरकम टैंकों को आसानी से निशाना बना सकते हैं।
इसके अतिरिक्त, वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन द्वारा तैनात किए गए आधुनिक और हल्के नेक्स्ट-जेनरेशन टैंकों ने भारतीय सेना के सामने नई रणनीतिक चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में भारत के वर्तमान T-90 'भीष्म' और T-72 'अजेय' टैंकों को समय रहते अपग्रेड करना भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम हो गया है।
स्पुतनिक इंडिया को दिए एक विशेष साक्षात्कार में, यूराल डिजाइन ब्यूरो ऑफ ट्रांसपोर्ट इंजीनियरिंग के चीफ डिजाइनर और जनरल डायरेक्टर आंद्रेई तेरलिकोव ने भारत के सामने सहयोग के तीन मुख्य स्तंभ रखे हैं:
1. ड्रोन और मिसाइल रोधी सुरक्षा
भारत के पुराने हो रहे T-72 और वर्तमान T-90 टैंकों को आधुनिक युद्ध के अनुकूल बनाने के लिए नए इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर (EW) सिस्टम, एडवांस्ड फायर कंट्रोल सिस्टम और ड्रोन-रोधी सुरक्षा कवच (Cope Cages & APS) से लैस करना।
2. यूक्रेन युद्ध के कड़े सबक
रूस अपने T-90M टैंक के युद्धकालीन अनुभवों को भारत के साथ साझा करना चाहता है। यूक्रेन में जो कमियां सामने आईं, उन्हें सुधारकर भारत के 'भीष्म' टैंकों को एक अभेद्य किले में तब्दील करने का प्रस्ताव है।
3. भविष्य के FRCV प्रोजेक्ट में साझेदारी
भारत अपने महत्वाकांक्षी FRCV (फ्यूचर रेडी कॉम्बैट व्हीकल) प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है, जो भविष्य में मुख्य युद्धक टैंक (MBT) की जगह लेगा। रूस इस परियोजना में अपने सबसे आधुनिक T-14 आर्मटा (Armata) प्लेटफॉर्म की अत्याधुनिक तकनीक साझा करने और संयुक्त विकास (Joint Development) के लिए तैयार है।
भारत की बख्तरबंद ताकत
भारत वर्तमान में दुनिया के सबसे बड़े टैंक ऑपरेटरों में से एक है। भारतीय सेना का मुख्य आधार रूसी मूल के टैंक ही हैं:
| टैंक का प्रकार | भारतीय नाम | अनुमानित संख्या | स्थिति/अपग्रेड की आवश्यकता |
| T-72 | अजेय (Ajeya) | 2,400+ | पुराने हो रहे हैं, तत्काल आधुनिक कवच और नाइट विजन की जरूरत। |
| T-90 | भीष्म (Bhishma) | 1,200+ | मुख्य युद्धक टैंक, ड्रोन रोधी प्रणाली और बेहतर इंजन की आवश्यकता। |
| कुल बेड़ा | — | 3,600+ | पूरी तरह से लाइसेंस के तहत भारत में निर्मित/असेंबल। |
जब भारत ने बचाया था रूसी टैंक उद्योग को
यह सहयोग केवल एकतरफा नहीं है। आज रूस अगर भारत की मदद के लिए हाथ बढ़ा रहा है, तो इसके पीछे भारत का वह अहसान है जिसे रूसी रक्षा विशेषज्ञ कभी नहीं भूल सकते।
1990 का आर्थिक संकट: सोवियत संघ के विघटन के बाद 1990 के दशक के अंत में रूस भयानक आर्थिक मंदी से जूझ रहा था। रूस की प्रसिद्ध टैंक निर्माता कंपनी उरलवागोनज़ावोड (Uralvagonzavod) पूरी तरह बंद होने की कगार पर थी। उनके पास T-90 का बेहतरीन डिजाइन था, लेकिन रूसी सेना के पास उसे खरीदने के पैसे नहीं थे।
15 फरवरी 2001 का ऐतिहासिक समझौता
संकट के इस दौर में भारत आगे आया और थार के रेगिस्तान में कड़े परीक्षणों के बाद लगभग $600-$750 मिलियन का एक मेगा-ऑर्डर दिया।
इस सौदे के तहत 310 T-90S टैंकों का ऑर्डर दिया गया (124 सीधे रूस से और 186 भारत में असेंबल करने के लिए)।
इसके बाद भारत ने हैवी व्हीकल्स फैक्ट्री (HVF), आवडी (चेन्नई) में 'ट्रांसफर ऑफ टेक्नोलॉजी' (ToT) के तहत स्थानीय स्तर पर 1,000 और T-90 टैंकों के निर्माण का समझौता किया। हाल ही में इस फैक्ट्री ने अपने 1000वें टैंक का सफल प्रोडक्शन भी पूरा कर लिया है।
आगे की राह
आंद्रेई तेरलिकोव के अनुसार, रूस नई तकनीकों पर तेजी से काम कर रहा है और भारतीय रक्षा मंत्रालय की संवेदनशीलता को समझता है। रूस का यह ऑफर भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' नीति के तहत 'मेक इन इंडिया' को बढ़ावा देने वाला हो सकता है, बशर्ते इसमें पूर्ण तकनीकी हस्तांतरण (Full Technology Transfer) शामिल हो। अब गेंद भारत के पाले में है कि वह इस रूसी प्रस्ताव को अपनी भविष्य की रक्षा रणनीतियों में किस तरह शामिल करता है।
