कुपोषण को खत्म करने और गर्भवती महिलाओं व छोटे बच्चों को पोषण देने के लिए चलाई जा रही टेक होम राशन (टीएचआर) योजना इंदौर में दम तोड़ती नजर आ रही है। सरकारी समीक्षा में सामने आए आंकड़ों ने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रदेश के सबसे बड़े जिलों में शामिल इंदौर में करीब 96 हजार पात्र हितग्राहियों में से केवल 8,814 बच्चों और महिलाओं तक ही राशन पहुंच पाया। यानी महज 9.2 प्रतिशत वितरण हुआ, जबकि 90 प्रतिशत से ज्यादा पात्र हितग्राही योजना के लाभ से वंचित रह गए।
संभाग में सबसे खराब रहा इंदौर का प्रदर्शन
रिपोर्ट के मुताबिक, टेक होम राशन वितरण में इंदौर पूरे संभाग में सबसे पीछे है। जहां खरगोन में 88 प्रतिशत, झाबुआ में 69 प्रतिशत और धार में 45 प्रतिशत हितग्राहियों तक राशन पहुंच चुका है, वहीं इंदौर का प्रदर्शन सबसे खराब रहा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जिस जिले को प्रशासनिक व्यवस्था का मॉडल माना जाता है, वहीं पोषण जैसी अहम योजना क्यों पिछड़ गई?
बच्चों और गर्भवती महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर
यह योजना छह माह से छह वर्ष तक के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और धात्री माताओं को पौष्टिक आहार उपलब्ध कराने के लिए चलाई जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर पोषण आहार नहीं मिला तो इसका सीधा असर बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के साथ गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।
सप्लाई बाधित होने का दावा,
विभागीय अधिकारियों का कहना है कि राशन की सप्लाई प्रभावित होने के कारण वितरण नहीं हो सका। हालांकि समीक्षा रिपोर्ट में यह साफ नहीं किया गया कि सप्लाई आखिर क्यों प्रभावित हुई और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। समीक्षा बैठक में वितरण व्यवस्था सुधारने और नियमित मॉनिटरिंग के निर्देश जरूर दिए गए हैं, लेकिन अब तक किसी की जिम्मेदारी तय नहीं हुई है।दावों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
सरकार लगातार कुपोषण खत्म करने के दावे करती है, लेकिन इंदौर के आंकड़े इन दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं। जब पात्र हितग्राहियों के बड़े हिस्से तक राशन ही नहीं पहुंच पा रहा, तो योजना का उद्देश्य कैसे पूरा होगा? सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर बच्चों और गर्भवती महिलाओं का हक बीच रास्ते में किस वजह से अटक गया?
व्यवस्था सुधार के दावे, जवाब का इंतजार
समीक्षा बैठक के बाद अधिकारियों ने व्यवस्था सुधारने का भरोसा दिया है। लेकिन जब तक राशन हर पात्र हितग्राही तक नहीं पहुंचता, तब तक यह सवाल बना रहेगा कि कुपोषण से लड़ने की सरकारी योजना आखिर जमीन पर कब असर दिखाएगी।