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जुलाई 2026 में प्रदोष व्रत
जुलाई 2026 में प्रदोष व्रत
धर्म

 प्रदोष व्रत : जुलाई में दो बार रखा जाएगा प्रदोष व्रत, जानें तिथि, शुभ मुहूर्त और पूजा का महत्व

जुलाई 2026 में प्रदोष व्रत 12 और 26 जुलाई को रखा जाएगा। भगवान शिव की पूजा प्रदोष काल में करना सबसे शुभ माना जाता है। जानें दोनों व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, धार्मिक महत्व और संपूर्ण पूजा विधि।

कीर्तिमान डेस्क
कीर्तिमान डेस्क
07 Jul 2026, 07:52 AM
नई दिल्ली
भगवान शिव की आराधना के लिए प्रदोष व्रत को अत्यंत शुभ माना जाता है। यह व्रत प्रत्येक माह शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष काल में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और सुख-समृद्धि का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि हर महीने श्रद्धालु इस व्रत का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

जुलाई 2026 में कब है पहला प्रदोष व्रत ? 

वैदिक पंचांग के अनुसार जुलाई 2026 का पहला प्रदोष व्रत 12 जुलाई, रविवार को रखा जाएगा। त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 11 जुलाई को रात 2:05 बजे होगी और इसका समापन 12 जुलाई को रात 10:31 बजे होगा। रविवार के दिन पड़ने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत कहा जाएगा।

दूसरा प्रदोष व्रत कब रखा जाएगा ? 

जुलाई का दूसरा प्रदोष व्रत 26 जुलाई को रखा जाएगा। इस दिन त्रयोदशी तिथि दोपहर 1:58 बजे प्रारंभ होगी और 27 जुलाई को शाम 4:15 बजे समाप्त होगी। हालांकि 27 जुलाई को प्रदोष काल शुरू होने से पहले ही त्रयोदशी तिथि समाप्त हो जाएगी। इसलिए शास्त्रीय नियमों के अनुसार यह व्रत 26 जुलाई को ही किया जाएगा। 

प्रदोष काल का धार्मिक महत्व

 हिंदू धर्म में प्रदोष काल को भगवान शिव की उपासना का सबसे श्रेष्ठ समय माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस अवधि में की गई पूजा और मंत्र जाप का विशेष फल प्राप्त होता है। कहा जाता है कि इस समय भगवान शिव अपने भक्तों की प्रार्थना शीघ्र स्वीकार करते हैं और उन पर कृपा बरसाते हैं। श्रद्धा, सच्चे मन और अच्छे कर्मों के साथ की गई पूजा को विशेष फलदायी माना गया है।

प्रदोष व्रत की पूजा विधि

 प्रदोष व्रत वाले दिन सुबह स्नान कर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। श्रद्धा और क्षमता के अनुसार पूरे दिन फलाहार या निर्जल व्रत रखा जा सकता है। शाम को प्रदोष काल में शिवलिंग का जल, गंगाजल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करें। इसके बाद भगवान शिव को बेलपत्र, धतूरा, चंदन, भस्म, पुष्प और फल अर्पित करें। घी का दीपक जलाकर 'ॐ नमः शिवाय' या महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। यदि संभव हो तो शिव चालीसा, रुद्राष्टकम अथवा प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव और माता पार्वती की आरती कर प्रसाद अर्पित करें तथा विधि-विधान से व्रत का पारण करें।
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