Ranabaali Movie Review: साउथ सिनेमा के दो बड़े चेहरे—विजय देवरकोंडा और रश्मिका मंदाना, एक बार फिर बड़े पर्दे पर साथ नजर आ रहे हैं। राहुल सांकृत्यायन के निर्देशन में बनी फिल्म 'रणबाली' (Ranabaali) सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। इस जोड़ी के फैंस के बीच फिल्म को लेकर काफी उत्साह था, खासकर इसलिए भी क्योंकि शादी के बाद यह दोनों की एक साथ पहली रिलीज़ है। अगर आप भी वीकेंड पर 'रणबाली' देखने का मन बना रहे हैं, तो टिकट बुक करने से पहले यह Review जरूर पढ़ लें।
क्या है फिल्म की कहानी ?
कहानी का ताना-बाना 1990 और 2000 के दशक की उन बहुचर्चित 'फैक्शन फिल्मों' के दौर की याद दिलाता है, जहाँ तीखे संवाद, खून-खराबा, दरांती और बदले की आग पर्दे पर छाई रहती थी। फिल्म में मुख्य किरदार सिंगनमला बोब्बिली रणबाली (विजय देवरकोंडा) का जन्म ही एक बेहद नाटकीय परिस्थिति में होता है। उसके पास समय की कमी है और स्थितियां लगातार जटिल होती जा रही हैं। रणबाली की मां राजप्पा (ईश्वरी राव) चाहती हैं कि दुनिया से जाने से पहले उनके बेटे का घर बस जाए, ताकि परिवार को एक वारिस मिल सके। इसी सिलसिले में रणबाली की शादी जयाम्मा (रश्मिका मंदाना) से करा दी जाती है। दूसरी तरफ कहानी में एंट्री होती है ब्रिटिश अधिकारी सर थियोडोर हेक्टर (अर्नोल्ड वोस्लू) की, जो मद्रास प्रेसीडेंसी में तैनात है। हेक्टर का एक ही मकसद है—साम्राज्य के लिए हर हाल में अनाज जुटाना, चाहे इसके लिए स्थानीय आबादी को भुखमरी की कगार पर ही क्यों न धकेलना पड़े। ऐसे माहौल में रणबाली अपने लोगों को अंग्रेजों के जुल्म और अकाल से कैसे बचाता है, पूरी फिल्म इसी संघर्ष पर टिकी है।
फिल्म की मजबूती और कसावट
निर्देशक राहुल सांकृत्यायन ने औपनिवेशिक दौर की क्रूरता को पर्दे पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। इतिहास की कड़वी सच्चाई को बयां करने के लिए उन्होंने 1800 के दशक के 'ग्रेट फेमिन' (महान अकाल) की वास्तविक और ऐतिहासिक तस्वीरों को भी फिल्म के दृश्यों के साथ पिरोया है। यह प्रयोग दर्शकों को उस दौर की विभीषिका से सीधे जोड़ता है। फिल्म यह भी दिखाती है कि कैसे अंग्रेजों की नीतियों के अलावा आपसी रंजिशों ने भी भारतीयों को भारी नुकसान पहुँचाया। शुरुआती दृश्यों में अपनी रक्षा के लिए रणबाली द्वारा उठाया गया खूनी कदम और उसके बाद के घटनाक्रम कहानी में गंभीर मोड़ लाते हैं।कहाँ चूक गई फिल्म ?
- जरूरत से ज्यादा हिंसा और खिंचाव: अंग्रेजों के अत्याचार को दिखाते-दिखाते फिल्म कई जगहों पर काफी डरावनी और असहज करने वाली बन जाती है। शुरुआत में जो दृश्य प्रभाव छोड़ते हैं, धीरे-धीरे वही बहुत ज्यादा दोहराव भरे लगने लगते हैं।
- धीमी भावनाएं और कमजोर जुड़ाव: फिल्म में किरदारों की भरमार है, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पनपने का पूरा मौका नहीं देता। नतीजा यह होता है कि दर्शक पर्दे पर चल रहे ड्रामे से भावनात्मक रूप से गहराई से नहीं जुड़ पाते।
- लगातार शोर-शराबा: फिल्म में लाउड टोन की अधिकता है। चाहे विलेन हो या हीरो, लगभग हर किरदार ज्यादातर दृश्यों में चीखता-चिल्लाता ही नजर आता है। संवादों का यह तीखापन एक समय के बाद थोड़ा थकाऊ लगने लगता है। भावनाओं के बजाय हिंसा और चिल्लाहट पर अधिक जोर दिया गया है।
कलाकारों का प्रदर्शन
- विजय देवरकोंडा: रणबाली के एंग्री और मास अवतार में विजय ने पूरी ताकत झोंकी है, लेकिन स्क्रीनप्ले की सीमाओं के कारण उनका किरदार लगातार एक ही टोन में नजर आता है।
- रश्मिका मंदाना: इस पूरे शोर-शराबे के बीच रश्मिका मंदाना (जयाम्मा) का किरदार राहत की सांस लेकर आता है। हालांकि कुछ गानों में उनकी लिप-सिंकिंग थोड़ी असहज लगती है, फिर भी उनकी स्क्रीन प्रेजेंस और अदाकारी फिल्म को एक ठहराव देती है। सही मायनों में, जब-जब रश्मिका स्क्रीन पर आती हैं, कहानी में जान आ जाती है।
रणबाली' इस बात को इतिहास के पन्नों से उठाने की कोशिश जरूर करती है कि आम भारतीयों ने ब्रिटिश हुकूमत के जुल्मों का सामना किस तरह किया। लेकिन एक्शन, मास अपील और ऐतिहासिक ड्रामा के चक्कर में फिल्म की मूल आत्मा कहीं पीछे छूट जाती है। अगर आप विजय-रश्मिका की जोड़ी और भारी-भरकम एक्शन-ड्रामा देखना पसंद करते हैं, तो इसे एक बार देखा जा सकता है। मुख्य जानकारी: फिल्म: रणबाली (Ranabaali) डायरेक्टर: राहुल सांकृत्यायन मुख्य कलाकार: विजय देवरकोंडा, रश्मिका मंदाना, अर्नोल्ड वोस्लू, ईश्वरी राव







