मोदी सरकार में 'पारदर्शिता' (Transparency) सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि काम करने का नया तरीका बन चुकी है। इसका सबसे ताजा और हैरान कर देने वाला उदाहरण इन दिनों नई दिल्ली के संचार भवन में देखने को मिल रहा है। संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने कार्यालय का ऐसा कायाकल्प (रिनोवेशन) कराया है, जिसे देखकर वहां से गुजरने वाले कर्मचारी और आगंतुक दंग हैं।
सिंधिया का नया दफ्तर अब कोई बंद सरकारी कमरा नहीं, बल्कि पूरी तरह से शीशे का एक पारदर्शी केबिन बन चुका है।
बंद कोठरी से 'ओपन डोर पॉलिसी' तक का सफर
जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ने संचार मंत्रालय का कार्यभार संभाला, तब पहली मंजिल पर स्थित मंत्री का आधिकारिक कमरा दशकों पुरानी व्यवस्था की तरह चारों तरफ से पूरी तरह बंद था।
दमघोंटू माहौल: कमरे की बनावट ऐसी थी कि वहां न तो प्राकृतिक रोशनी (धूप) पहुंचती थी और न ही ताजी हवा।
कमरे के अंदर कमरा: दशकों पुरानी परंपरा के तहत मुख्य केबिन के भीतर ही एक गुप्त 'रेस्ट रूम' भी बनाया गया था।
फर्नीचर का अंबार: भारी-भरकम और गैर-जरूरी फर्नीचर की वजह से कमरे में पैर रखने तक की जगह नहीं बची थी।
सिंधिया का त्वरित फैसला: संचार मंत्री को लगा कि ऐसे बंद और दमघोंटू माहौल में न तो नए विचार आ सकते हैं और न ही तेजी से काम हो सकता है। उन्होंने तुरंत आदेश दिया—"इस बंद कोठरी कल्चर को खत्म करो।"
कैसे काम करती है यह 'डिजिटल युग की पारदर्शिता'?
मंत्रालय के पहले फ्लोर का पूरी तरह से कायाकल्प कर दिया गया है। भारी दीवारें और लकड़ी के दरवाजे हटाकर वहां हाई-क्वालिटी पारदर्शी शीशे (गिलास वॉल्स) लगा दिए गए हैं।
| पुरानी व्यवस्था | सिंधिया का नया 'ग्लास ऑफिस' |
| चारों तरफ से बंद और गुप्त कमरा। | 100% पारदर्शी, आर-पार दिखने वाला केबिन। |
| भारी-भरकम और जगह घेरने वाला पुराना फर्नीचर। | स्लीक, मॉडर्न और कम जगह लेने वाला स्मार्ट इंटीरियर। |
| वीआईपी और आम जनता के बीच गहरी दूरी। | बाहर से इशारा करके भी बात करने की सहूलियत। |
अब आलम यह है कि बाहर से गुजर रहा कोई भी कर्मचारी या अपनी बारी का इंतजार कर रहा आगंतुक साफ देख सकता है कि अंदर मंत्री जी क्या फाइल देख रहे हैं या किससे मीटिंग कर रहे हैं। वहीं, अंदर बैठे सिंधिया भी बाहर की हर हलचल पर नजर रख सकते हैं।
कर्मचारी क्यों कह रहे हैं इसे 'खुला दरबार'?
संचार भवन के कर्मचारियों के बीच यह नया दफ्तर कौतूहल और तारीफ का विषय बना हुआ है। स्टाफ का कहना है कि उन्होंने अपने पूरे करियर में किसी केंद्रीय मंत्री का ऐसा 'खुला दरबार' नहीं देखा।
जवाबदेही बढ़ी: जब सब कुछ सामने दिख रहा हो, तो काम की रफ्तार अपने आप बढ़ जाती है।
सुलभता (Accessibility): यदि कोई आगंतुक बाहर खड़ा है, तो मंत्री चाहें तो उसे सीधे देखकर तुरंत अंदर बुला लेते हैं। औपचारिकताएं और लंबा इंतजार अब खत्म हो रहा है।
पॉजिटिव वाइब्स: प्राकृतिक रोशनी और खुलेपन के कारण दफ्तर का तनावपूर्ण माहौल अब बेहद पॉजिटिव और एनर्जी से भरपूर नजर आता है।
संदेश साफ है...
ज्योतिरादित्य सिंधिया का यह कदम सिर्फ एक दफ्तर का रेनोवेशन नहीं है, बल्कि यह 'न्यू इंडिया' के उस वर्क कल्चर का प्रतीक है जहां सरकार और जनता के बीच की दीवारें (चाहे वो कंक्रीट की हों या लालफीताशाही की) धीरे-धीरे गिराई जा रही हैं। यह कांच का कमरा चीख-चीख कर कह रहा है—जब नियत साफ है, तो काम छुपाकर क्यों करना?
