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F-35 स्टील्थ फाइटर जेट
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रक्षा

अमेरिकी वायुसेना में हड़कंप : क्यों जंग की हालत में चीन के आगे पस्त हो सकता है सुपरपावर का सबसे घातक F-35 स्टील्थ फाइटर?

अमेरिका का सबसे आधुनिक पांचवीं पीढ़ी का F-35 स्टील्थ फाइटर जेट प्रोग्राम गंभीर रखरखाव और तकनीकी समस्याओं से जूझ रहा है। अमेरिकी जांच एजेंसी GAO की रिपोर्ट के अनुसार, F-35 विमानों की फुल मिशन-कैपेबल दर 2021 के 38% से घटकर लगभग 25% रह गई है। इसका अर्थ है कि हर चार में से केवल एक विमान ही सभी प्रकार के युद्ध अभियानों के लिए पूरी तरह तैयार है।

अप्पू धीवर |  कीर्तिमान न्यूज
प्रकाशित: 20 Jun 2026, 03:16 PM · अपडेट: 02 Oct 2026, 04:45 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

दुनियाभर में अपनी सैन्य ताकत का लोहा मनवाने वाले अमेरिका के लिए रक्षा मोर्चे से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमेरिकी वायु शक्ति की सबसे बड़ी रीढ़ माना जाने वाला पांचवीं पीढ़ी का 'F-35 स्टील्थ फाइटर जेट' इस समय एक बड़े आंतरिक संकट से जूझ रहा है। संकट किसी बाहरी दुश्मन का नहीं, बल्कि इसके खुद के रखरखाव और तकनीकी खराबी का है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि रक्षा विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि यदि इस समय ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच युद्ध छिड़ता है, तो सुपरपावर अमेरिका को मुंह की खानी पड़ सकती है।

दरअसल, अमेरिकी सरकार की शीर्ष जांच एजेंसी 'गवर्नमेंट अकाउंटेबिलिटी ऑफिस' (GAO) की हालिया रिपोर्ट ने अमेरिकी रक्षा मंत्रालय (पेंटागन) के दावों की हवा निकाल दी है। इस रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि F-35 प्रोग्राम का 'फुल मिशन-कैपेबल रेट' (यानी हर तरह के युद्ध के लिए पूरी तरह तैयार विमानों की दर) साल 2021 के 38% से गिरकर अब महज 25% पर आ गया है।

कागजों पर 'महाबली', हकीकत में 4 में से 3 विमान बेकार

इस तकनीकी भाषा को अगर आसान शब्दों में समझें, तो इसका मतलब यह हुआ कि अमेरिकी सेना के बेड़े में शामिल हर 4 में से केवल 1 F-35 विमान ही इस स्थिति में है कि वह युद्ध के समय बमबारी, हवाई हमला या जासूसी जैसे अपने सभी मिशनों को अंजाम दे सके। बाकी के 75 फीसदी विमान किसी न किसी तकनीकी खामी या पुर्जों की कमी के कारण पूरी तरह तैयार नहीं हैं।

सैन्य विश्लेषकों का मानना है कि यदि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ताइवान पर हमला करती है, तो अमेरिका चाहकर भी ताइवान की रक्षा नहीं कर पाएगा, क्योंकि उसके सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान हैंगरों में खड़े धूल फांक रहे हैं।

अरबों डॉलर खर्च, फिर भी प्राइवेट कॉन्ट्रैक्टर्स के आगे बेबस पेंटागन

जांचकर्ताओं के मुताबिक, इस महासंकट के पीछे दो सबसे बड़ी वजहें हैं— सप्लाय चेन की पुरानी कंगाली और निजी कंपनियों पर आंख मूंदकर भरोसा। पूरी फ्लीट का ओवरऑल रेडीनेस रेट सिर्फ पांच वर्षों में 67% से लुढ़ककर 44% पर आ गया है।

इस व्यवस्था को सुधारने के लिए अमेरिकी 'जॉइंट प्रोग्राम ऑफिस' (JPO) ने 13.7 अरब डॉलर (करीब 1.1 लाख करोड़ रुपये) का 'ग्लोबल सपोर्ट सॉल्यूशन' प्लान तैयार किया है। लेकिन जानकारों का कहना है कि यह योजना भी फेल होने की कगार पर है। इसकी वजह यह है कि अमेरिकी सेना इन विमानों के मेंटेनेंस के लिए पूरी तरह से 'लॉकहीड मार्टिन' जैसी प्राइवेट कंपनियों पर निर्भर है। सेना के पास खुद का ऐसा कोई मजबूत ढांचा नहीं है जो तुरंत इन खराबी को ठीक कर सके। ऊपर से 2030 के दशक तक इस प्रोग्राम में हर साल 1 अरब डॉलर से ज्यादा की फंडिंग कम पड़ने की आशंका है।

खराबी की तीन सबसे बड़ी वजहें:

  1. स्पेयर पार्ट्स की किल्लत: विमानों के पुर्जे खराब होने के बाद महीनों तक नए पार्ट्स नहीं मिल पाते, जिससे करोड़ों का विमान जमीन पर खड़ा रह जाता है।

  2. सॉफ्टवेयर और डिजिटल अपग्रेड में देरी: विमान के नए डिजिटल सिस्टम जैसे 'Technology Refresh 3' के डेवलपमेंट में लगातार देरी हो रही है, जिससे नए विमान भी सेना के काम नहीं आ पा रहे हैं।

  3. कम संख्या: इस मेंटेनेंस संकट का असर यह है कि किसी भी आपातकालीन युद्ध की स्थिति में अमेरिका के पास तुरंत मोर्चे पर भेजने के लिए कुल मिलाकर (F-15E, F-16 और F-35 को मिलाकर) केवल 354 लड़ाकू विमान ही पूरी तरह एक्टिव मोड में बचते हैं, जो चीन के विशाल हवाई बेड़े के सामने बेहद कम हैं।

क्यों F-35 का नाकाम होना अमेरिका के लिए बड़ी रणनीतिक तबाही है?

यह केवल बजट की बर्बादी का मामला नहीं है, बल्कि यह अमेरिकी वर्चस्व के खत्म होने का संकेत है। एयरफोर्स डिपार्टमेंट की एक आंतरिक रिपोर्ट के अनुसार, F-35 को अमेरिकी वायुसेना का मुख्य आधार इसलिए बनाया गया था क्योंकि इसमें दुश्मन के एयर डिफेंस यानी मिसाइल सिस्टम को तबाह करने की विशेष क्षमता (SEAD) है।

F-35 की इसी 'स्टील्थ' (रडार से बचने की) खूबी के दम पर अमेरिका दुश्मन के इलाके में घुसने का दम भरता था। अब जब F-35 ही तैयार नहीं हैं, तो अमेरिका के पुराने चौथी पीढ़ी के विमान (जैसे F-15 और F-16) चीन के खतरनाक रूसी S-400 और स्वदेशी HQ-9B मिसाइल डिफेंस सिस्टम के सामने टिक नहीं पाएंगे और आसानी से मार गिराए जाएंगे।

भारत के लिए 'वरदान' साबित हुआ डोनाल्ड ट्रंप को दिया वो इनकार

इस पूरे विवाद के बीच भारत के लिहाज से एक बेहद दिलचस्प पहलू सामने आया है। अपने पिछले कार्यकाल के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को F-35 स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने का ऑफर दिया था। हालांकि, भारत सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक दिलचस्पी नहीं दिखाई और दूरी बनाए रखी।

भारतीय रक्षा विशेषज्ञों का हमेशा से मानना था कि अमेरिका से इस तरह के संवेदनशील विमान खरीदने का मतलब होगा— जीवनभर के लिए मेंटेनेंस और स्पेयर पार्ट्स के लिए वाशिंगटन पर निर्भर हो जाना। आज जब अमेरिका खुद अपने F-35 के रख-रखाव को लेकर अपनी ही निजी कंपनियों के आगे लाचार खड़ा है, तो यह साफ हो जाता है कि भारत का इसे न खरीदने का फैसला रणनीतिक रूप से कितना दूरदर्शी और सटीक था। अगर भारत इस सौदे में फंस जाता, तो आज भारतीय वायुसेना भी इसी तरह के बड़े संकट से जूझ रही होती।

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