सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के एक फैसले पर गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि किसी भी न्यायिक फैसले में मनगढ़ंत या अस्तित्वहीन कानूनी उदाहरणों का इस्तेमाल बेहद खतरनाक है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि फैसला लेने की प्रक्रिया में अंतिम जिम्मेदारी हमेशा इंसान की ही रहनी चाहिए।
मामला एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स के दिवालियापन से जुड़ा है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि NCLT ने अपने आदेश में ऐसे कानूनी उदाहरणों का उल्लेख किया था, जिनका वास्तविक अस्तित्व नहीं था। इन्हीं आधारों पर सुप्रीम कोर्ट ने NCLT और बाद में NCLAT के फैसले को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि न्यायिक फैसलों में गलत और मनगढ़ंत सामग्री का इस्तेमाल न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाता है। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की गलत जानकारी का उपयोग कानून और न्याय व्यवस्था के लिए बेहद गंभीर खतरा है। इससे न्यायिक फैसलों की बुनियाद कमजोर हो सकती है।
हर स्तर पर इंसानी निगरानी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नई तकनीक काम को आसान बना सकती है, लेकिन फैसला लेने की पूरी प्रक्रिया पर इंसानी नियंत्रण बना रहना चाहिए। अदालत ने कहा कि तकनीक को केवल सहायक के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए, न कि निर्णय लेने का विकल्प बनाया जाए। कोर्ट ने यह भी कहा कि आज काम का दबाव बढ़ने के कारण पेशेवर नई तकनीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन बिना पूरी जांच के उन पर निर्भर होना जोखिम भरा हो सकता है।
अदालत ने दी सावधानी बरतने की सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी जानकारी की पूरी तरह जांच जरूरी है। अगर बिना सत्यापन के गलत कानूनी उदाहरणों का इस्तेमाल होने लगे, तो इससे न्याय व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह गलत जानकारी बनने की तकनीकी प्रक्रिया पर टिप्पणी नहीं कर रहा है। यह विषय विशेषज्ञों का क्षेत्र है। अदालत का उद्देश्य केवल न्यायिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखना है।
बार काउंसिल को दिए निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया को इस पूरे मामले की जांच के लिए एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है। समिति इस तरह की घटनाओं की समीक्षा करेगी और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के उपाय सुझाएगी।क्या है पूरा मामला
यह मामला एस्सेल इंफ्राप्रोजेक्ट्स के खिलाफ 87.43 करोड़ रुपये के बकाया दावे से जुड़ा है। NCLT की मुंबई पीठ ने 28 अगस्त 2024 को कंपनी के खिलाफ दिवालियापन प्रक्रिया शुरू करने की अनुमति दी थी। बाद में NCLAT ने भी इस आदेश को बरकरार रखा। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फैसले में जिन कानूनी उदाहरणों का सहारा लिया गया था, वे वास्तविक नहीं थे। इसके बाद कोर्ट ने दोनों आदेश रद्द करते हुए मामले को दोबारा तथ्यों के आधार पर सुनवाई के लिए भेज दिया।