3 मई 1999... भारतीय सैन्य इतिहास की वो तारीख, जब कारगिल के बटालिक सेक्टर में एक स्थानीय चरवाहे ने सेना को कुछ संदिग्ध लोगों के मौजूद होने की खबर दी। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह एक बड़े युद्ध की आहट है। इसके बाद एक-एक कर कारगिल, द्रास और बटालिक की बर्फीली चोटियों से पाकिस्तानी सेना की घुसपैठ की खौफनाक तस्वीरें सामने आने लगीं।
भारतीय सेना ने तुरंत मोर्चा संभाला और घुसपैठियों के भेष में छिपे पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ने के लिए 'ऑपरेशन विजय' का शंखनाद कर दिया। लेकिन राह आसान नहीं थी। दुश्मन 18,000 फीट की सीधी और दुर्गम ऊंचाइयों पर बंकर बनाकर बैठा था। नीचे से ऊपर बढ़ रहे भारतीय जांबाजों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा था। ऐसे संकट के समय, आज ही के दिन यानी 26 मई 1999 को भारतीय वायुसेना 'काल' बनकर आसमान से उतरी और शुरू हुआ इतिहास का सबसे साहसिक हवाई अभियान— 'ऑपरेशन सफेद सागर'।
क्या है 'ऑपरेशन सफेद सागर' और क्यों पड़ा यह नाम?
कारगिल युद्ध के दौरान थलसेना (इंडियन आर्मी) को हवाई कवर देने और दुश्मन के ठिकानों को नेस्तनाबूद करने के लिए वायुसेना ने इस ऑपरेशन को शुरू किया था।
नाम के पीछे की कहानी: कारगिल का पूरा इलाका सालभर बर्फ की सफेद चादर से ढका रहता है। इतनी ऊंचाई से देखने पर यह इलाका किसी सफेद समंदर जैसा नजर आता है। जैसे विशाल समंदर में गिरे किसी इंसान को ढूंढना नामुमकिन होता है, वैसे ही बर्फ के इस 'सफेद सागर' में छिपे दुश्मन के छोटे-छोटे बंकरों को खोजना वायुसेना के लिए एक बेहद जटिल चुनौती थी। इसी वजह से वायुसेना ने अपने इस मिशन को 'ऑपरेशन सफेद सागर' का नाम दिया।
चेतक से मिराज तक: कैसे बदला युद्ध का रुख?
26 मई 1999 को वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने पहली बार आधिकारिक तौर पर उड़ान भरी। शुरुआत में मिग-21, मिग-17, जगुआर, मिग-23, मिग-27 और चेतक हेलीकॉप्टरों को इस मिशन में लगाया गया। लेकिन कड़ाके की ठंड, पतली हवा और बेहद ऊंचाई के कारण शुरुआती दिनों में वायुसेना को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा और अपने कुछ जांबाज पायलटों व विमानों को खोना भी पड़ा।
इसके बाद वायुसेना ने अपनी रणनीति बदली और मैदान में उतारा अपने सबसे आधुनिक लड़ाकू विमान 'मिराज-2000' को। मिराज-2000 ने युद्ध की पूरी दिशा ही बदल दी:
लेजर-गाइडेड बमों का कहर: मिराज विमानों ने पहली बार इतनी ऊंचाई पर लेजर-गाइडेड बमों का सटीक इस्तेमाल किया।
बंकरों का खात्मा: दुश्मन के कमांड पोस्ट, रसद (सप्लाई) डिपो और पहाड़ों को काटकर बनाए गए अभेद्य बंकरों को हवा में ही उड़ा दिया गया।
ऐतिहासिक फतह: युद्ध के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ यानी 'टाइगर हिल' और 'मुंथो ढालो' पर वायुसेना के सटीक हमलों ने पाकिस्तानी फौज की कमर तोड़ दी।
आसमान में वो 4 बड़ी चुनौतियां, जिसने दुनिया को चौंकाया
यह ऑपरेशन दुनिया के सैन्य इतिहास में सबसे कठिन माना जाता है, क्योंकि हमारे पायलटों के सामने ये चार बड़ी दीवारें थीं:
ऊंचाई का फायदा: दुश्मन रणनीतिक रूप से बेहद ऊंची चोटियों पर था, जहाँ से वो विमानों पर मिसाइल दाग सकता था।
कातिलाना मौसम: बर्फीली हवाएं, कम दृश्यता (Visibility) और पहाड़ों के बीच विमान को संभालना मौत से खेलने जैसा था।
टारगेट की पहचान: सफेद बर्फ के बीच दुश्मन के पत्थरों जैसे बंकरों को पहचानना बेहद मुश्किल था।
सख्त हिदायत (नो एलओसी क्रॉस): भारत सरकार का सख्त आदेश था कि किसी भी परिस्थिति में नियंत्रण रेखा (LoC) पार नहीं होनी चाहिए। यानी भारतीय पायलटों को एलओसी के इस पार रहते हुए ही सीमा पार बैठे दुश्मन पर सटीक निशाना लगाना था, जो कि तकनीकी रूप से बेहद कठिन था।
वायुसेना ने वीडियो शेयर कर ताजा की यादें: "यह सैन्य इतिहास का मील का पत्थर है"
आज इस ऐतिहासिक दिन पर भारतीय वायुसेना (IAF) ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (Twitter) पर एक बेहद भावुक और जोश से भर देने वाला वीडियो साझा किया है।
वायुसेना ने लिखा: "26 मई 1999: ऑपरेशन सफेद सागर।"
वायुसेना ने इस गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए आगे लिखा:
"यह 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद कश्मीर क्षेत्र में हवाई शक्ति का पहला बड़े पैमाने पर उपयोग था। इतने ऊंचे और दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र में सटीक हवाई अभियानों का यह दुनिया का पहला मौका था, जिसने वैश्विक सैन्य उड्डयन (Military Aviation) के इतिहास में एक अमिट मील का पत्थर स्थापित कर दिया।"
'ऑपरेशन सफेद सागर' महज एक हवाई हमला नहीं था, बल्कि यह भारतीय वायुसेना के अदम्य साहस, विपरीत परिस्थितियों में खुद को ढालने की क्षमता और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने के जज्बे का प्रतीक है। इसी ऑपरेशन की बदौलत आज कारगिल की चोटियों पर तिरंगा शान से लहरा रहा है।
