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महिलाओं में उम्र बढ़ने के साथ कई प्राकृतिक बदलाव होते हैं
महिलाओं में उम्र बढ़ने के साथ कई प्राकृतिक बदलाव होते हैं
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पेरिमेनोपॉज : महिलाओं में बदलते पीरियड्स और मानसिक स्वास्थ्य पर बड़ा असर

40 की उम्र के बाद महिलाओं में पेरिमेनोपॉज के कारण पीरियड्स अनियमित होने लगते हैं। इस दौरान हार्मोनल बदलाव के चलते हॉट फ्लैश, मूड स्विंग, नींद की समस्या और मानसिक तनाव जैसे कई लक्षण दिखाई दे सकते हैं।

कीर्तिमान नेटवर्क
15 May 2026, 06:54 PM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश

महिलाओं के शरीर में उम्र बढ़ने के साथ कई प्राकृतिक बदलाव होते हैं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण बदलावों में से एक है पेरिमेनोपॉज, जो मेनोपॉज से पहले शुरू होने वाली अवस्था होती है। इस दौरान महिलाओं के पीरियड्स अनियमित होने लगते हैं, शरीर में हार्मोनल बदलाव तेज हो जाते हैं और मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ने लगता है। विशेषज्ञों का कहना है कि 40 की उम्र के बाद पीरियड्स में बदलाव होना हमेशा बीमारी का संकेत नहीं होता, बल्कि यह शरीर के प्राकृतिक परिवर्तन का हिस्सा हो सकता है। हालांकि कुछ मामलों में यह गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत भी हो सकता है, इसलिए जागरूक रहना बेहद जरूरी माना जाता है। डॉक्टरों के अनुसार कई महिलाएं इस दौर में डर और भ्रम का सामना करती हैं, क्योंकि उन्हें यह समझ नहीं आता कि उनके शरीर में हो रहे बदलाव सामान्य हैं या किसी बीमारी के संकेत। यही कारण है कि विशेषज्ञ पेरिमेनोपॉज और मेनोपॉज को लेकर जागरूकता बढ़ाने पर जोर दे रहे हैं।

पेरिमेनोपॉज

पेरिमेनोपॉज वह समय होता है, जब महिला का शरीर धीरे-धीरे प्रजनन क्षमता के अंतिम चरण यानी मेनोपॉज की ओर बढ़ता है। इस दौरान अंडाशय (Ovaries) धीरे-धीरे कम सक्रिय होने लगते हैं और एस्ट्रोजन तथा प्रोजेस्टेरोन जैसे महत्वपूर्ण हार्मोन का स्तर बदलने लगता है। पेरिमेनोपॉज आमतौर पर 40 की शुरुआत में शुरू होता है, लेकिन कुछ महिलाओं में यह 35 से 38 वर्ष की उम्र के बीच भी दिखाई दे सकता है। यह अवस्था कुछ महीनों से लेकर 8 से 10 वर्षों तक भी चल सकती है। मेनोपॉज तब माना जाता है, जब किसी महिला को लगातार 12 महीने तक पीरियड्स न आएं। उससे पहले का पूरा संक्रमणकाल पेरिमेनोपॉज कहलाता है।

क्यों अनियमित हो जाते हैं पीरियड्स

महिलाओं के मासिक चक्र को नियंत्रित करने में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पेरिमेनोपॉज के दौरान इन हार्मोन्स का स्तर स्थिर नहीं रहता। कभी हार्मोन ज्यादा बनते हैं तो कभी कम। इसी कारण ओव्यूलेशन नियमित नहीं हो पाता और पीरियड्स का पैटर्न बदलने लगता है।

इस दौरान दिखाई दे सकते हैं ये बदलाव

  • पीरियड्स जल्दी या देर से आना
  • महीनों तक पीरियड्स न आना
  • अचानक भारी ब्लीडिंग होना
  • बहुत कम रक्तस्राव होना
  • पीरियड्स की अवधि बढ़ना या कम होना
  • स्पॉटिंग की समस्या
  • ब्लड क्लॉट्स आना

विशेषज्ञ बताते हैं कि कई महिलाओं को पहले जहां 28 दिन का नियमित चक्र रहता था, वहीं पेरिमेनोपॉज में यह कभी 20 दिन तो कभी 40 दिन तक भी हो सकता है।

हारमोंस का प्रभाव 

पेरिमेनोपॉज के दौरान सिर्फ पीरियड्स ही अनियमित नहीं होते, बल्कि महिलाओं के शरीर और मानसिक स्वास्थ्य में भी कई बड़े बदलाव आने लगते हैं। इस समय शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन हार्मोन का स्तर लगातार बदलता रहता है, जिसका असर पूरे शरीर पर दिखाई देता है। कई महिलाओं को अचानक तेज गर्मी लगना, चेहरे पर लालिमा आना और अत्यधिक पसीना आने जैसी समस्याएं महसूस होती हैं, जिन्हें हॉट फ्लैश कहा जाता है। रात में ज्यादा पसीना आने के कारण नींद प्रभावित हो सकती है और कई बार महिलाएं पूरी रात ठीक से सो नहीं पातीं। इसके अलावा मूड स्विंग, चिड़चिड़ापन, तनाव, बेचैनी और उदासी जैसे मानसिक बदलाव भी आम हो जाते हैं। कुछ महिलाओं को लगातार थकान, कमजोरी, सिरदर्द और शरीर में भारीपन महसूस होता है। इस दौरान मेटाबॉलिज्म धीमा पड़ने से वजन बढ़ने की संभावना भी बढ़ जाती है। त्वचा का रूखापन, बालों का पतला होना और चमक कम होना जैसे बदलाव भी देखने को मिल सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पेरिमेनोपॉज सिर्फ हार्मोनल बदलाव नहीं, बल्कि महिलाओं के शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाला एक बड़ा संक्रमणकाल होता है, इसलिए इस दौरान सही देखभाल और जागरूकता बेहद जरूरी मानी जाती है।

कब हो सकती है गंभीर समस्या

विशेषज्ञों के अनुसार 40 की उम्र के बाद पीरियड्स का अनियमित होना अक्सर सामान्य हार्मोनल बदलाव का हिस्सा होता है, लेकिन कुछ लक्षणों को नजरअंदाज करना खतरनाक हो सकता है। यदि बहुत ज्यादा रक्तस्राव हो, हर घंटे पैड बदलने की जरूरत पड़े, लगातार कई दिनों तक भारी ब्लीडिंग हो या पीरियड्स के बीच बार-बार रक्तस्राव होने लगे, तो तुरंत डॉक्टर से जांच करवानी चाहिए। इसके अलावा तेज पेट दर्द, अचानक कमजोरी, चक्कर आना, सेक्स के बाद ब्लीडिंग या 40 की उम्र के बाद अचानक अत्यधिक अनियमित पीरियड्स भी गंभीर स्वास्थ्य समस्या का संकेत हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार फाइब्रॉइड, एंडोमेट्रियोसिस, थायरॉइड, पीसीओडी या गर्भाशय कैंसर जैसी बीमारियां भी ऐसे लक्षण पैदा कर सकती हैं, इसलिए समय पर जांच बेहद जरूरी मानी जाती है।

मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है असर

पेरिमेनोपॉज सिर्फ शारीरिक बदलाव नहीं लाता, बल्कि इसका असर महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता है। इस दौरान कई महिलाएं तनाव, चिंता, चिड़चिड़ापन, अकेलापन और आत्मविश्वास में कमी महसूस कर सकती हैं। हार्मोनल बदलाव के कारण मूड बार-बार बदल सकता है और कई बार छोटी-छोटी बातों पर भावनात्मक प्रतिक्रिया बढ़ जाती है। डॉक्टरों का कहना है कि समाज में आज भी महिलाओं के हार्मोनल स्वास्थ्य और मेनोपॉज पर खुलकर चर्चा नहीं होती, जिसके कारण कई महिलाएं अपनी परेशानियां साझा नहीं कर पातीं। विशेषज्ञों के मुताबिक इस समय परिवार का सहयोग, भावनात्मक समर्थन और सही जानकारी महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी होता है।

क्या प्रेग्नेंसी संभव है

कई महिलाओं को लगता है कि अनियमित पीरियड्स शुरू होते ही गर्भधारण की संभावना खत्म हो जाती है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार पेरिमेनोपॉज के दौरान भी प्रेग्नेंसी संभव हो सकती है। इस समय ओव्यूलेशन पूरी तरह बंद नहीं होता, इसलिए गर्भधारण का खतरा बना रहता है। डॉक्टरों का कहना है कि जब तक लगातार 12 महीने तक पीरियड्स पूरी तरह बंद न हो जाएं, तब तक गर्भनिरोधक उपाय अपनाना जरूरी माना जाता है। इसलिए इस दौरान महिलाओं को बिना सलाह के गर्भनिरोधक बंद नहीं करना चाहिए।

हार्मोन थेरेपी सुरक्षित है

कुछ महिलाओं में पेरिमेनोपॉज के लक्षण इतने गंभीर हो जाते हैं कि उन्हें राहत देने के लिए डॉक्टर हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (HRT) की सलाह देते हैं। इस थेरेपी में शरीर में कम हो रहे हार्मोन को नियंत्रित तरीके से दिया जाता है, जिससे हॉट फ्लैश, नींद की समस्या और मूड स्विंग जैसे लक्षण कम हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बिना डॉक्टर की सलाह के हार्मोनल दवाइयों का इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है। हर महिला की स्वास्थ्य स्थिति अलग होती है, इसलिए इलाज भी उसी के अनुसार तय किया जाता है। नियमित जांच और डॉक्टर की निगरानी में ही हार्मोन थेरेपी लेना सुरक्षित माना जाता है।
संतुलित और पौष्टिक आहार है बेहद जरूरी

बचाओ के उपाय 

विशेषज्ञों के मुताबिक पेरिमेनोपॉज के दौरान महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव तेजी से होते हैं। ऐसे में शरीर को सही पोषण मिलना बेहद जरूरी होता है। डॉक्टर महिलाओं को कैल्शियम, आयरन, प्रोटीन, फाइबर और विटामिन-D से भरपूर भोजन लेने की सलाह देते हैं। दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां, दालें, फल, अंडे और ड्राई फ्रूट्स शरीर को जरूरी पोषण देने में मदद करते हैं। इस दौरान आयरन की कमी से एनीमिया और कमजोरी की समस्या बढ़ सकती है, खासकर उन महिलाओं में जिन्हें ज्यादा ब्लीडिंग होती है। वहीं कैल्शियम और विटामिन-D की कमी से हड्डियां कमजोर होने का खतरा बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जंक फूड, अत्यधिक चीनी, तला-भुना भोजन और ज्यादा नमक वाली चीजों से दूरी बनाना बेहतर होता है, क्योंकि ये शरीर में सूजन, वजन बढ़ने और हार्मोनल असंतुलन को बढ़ा सकते हैं।

नियमित व्यायाम और योग से मिल सकती है राहत

डॉक्टरों के अनुसार नियमित शारीरिक गतिविधि पेरिमेनोपॉज के लक्षणों को नियंत्रित करने में काफी मददगार साबित हो सकती है। रोजाना 30 से 40 मिनट की वॉक, हल्का व्यायाम, योग और स्ट्रेचिंग शरीर को सक्रिय रखते हैं और हार्मोनल संतुलन बनाए रखने में मदद करते हैं।  व्यायाम करने से वजन नियंत्रित रहता है, नींद बेहतर होती है और मानसिक तनाव भी कम होता है। योग और मेडिटेशन विशेष रूप से हॉट फ्लैश, चिंता और मूड स्विंग जैसी समस्याओं में राहत देने के लिए फायदेमंद माने जाते हैं। कई रिसर्च में यह भी पाया गया है कि नियमित व्यायाम महिलाओं में हड्डियों की मजबूती बनाए रखने में मदद करता है, जो मेनोपॉज के बाद बेहद जरूरी हो जाता है।

पर्याप्त नींद और मानसिक शांति जरूरी

पेरिमेनोपॉज के दौरान कई महिलाओं को नींद न आने, रात में बार-बार जागने या बेचैनी की समस्या होने लगती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छी नींद शरीर और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए बेहद जरूरी है। डॉक्टर सलाह देते हैं कि महिलाएं देर रात तक मोबाइल या लैपटॉप का इस्तेमाल कम करें और सोने का नियमित समय तय करें। कैफीन और ज्यादा चाय-कॉफी का सेवन कम करना भी फायदेमंद माना जाता है। मानसिक तनाव को कम करने के लिए मेडिटेशन, गहरी सांस लेने की तकनीक और रिलैक्सेशन एक्सरसाइज मददगार हो सकती हैं।

तनाव और भावनात्मक बदलावों को समझना जरूरी

पेरिमेनोपॉज सिर्फ शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक बदलाव भी लेकर आता है। हार्मोनल उतार-चढ़ाव के कारण कई महिलाओं को चिड़चिड़ापन, उदासी, तनाव और आत्मविश्वास में कमी महसूस हो सकती है। इस दौरान महिलाओं को भावनात्मक सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। परिवार और करीबी लोगों का सहयोग मानसिक तनाव कम करने में मदद करता है। डॉक्टरों का कहना है कि महिलाओं को अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय खुलकर बात करनी चाहिए। यदि लगातार चिंता, अवसाद या मानसिक परेशानी महसूस हो, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी हो सकता है।
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