पश्चिम एशिया में जारी तनाव और Strait of Hormuz पर बढ़ती अस्थिरता ने एक बार फिर वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा को हिला दिया है। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए यह स्थिति बेहद संवेदनशील मानी जा रही है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर करता है, ऐसे में समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर अर्थव्यवस्था, ईंधन कीमतों और उद्योगों पर पड़ता है।इसी बीच ऊर्जा विशेषज्ञों और जियो-स्ट्रैटजिस्ट्स का मानना है कि यदि भारत और ओमान के बीच प्रस्तावित 1600 किलोमीटर लंबी गैस पाइपलाइन पहले ही तैयार हो चुकी होती, तो आज होर्मुज संकट का भारत पर लगभग कोई प्रभाव नहीं पड़ता।यह महत्वाकांक्षी योजना “ओमान–भारत डीप वॉटर पाइपलाइन प्रोजेक्ट” (OIDMPP) के नाम से वर्षों से चर्चा में है और इसे भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सबसे बड़े रणनीतिक प्रोजेक्ट्स में से एक माना जाता है
ओमान–भारत डीप वॉटर पाइपलाइन प्रोजेक्ट (OIDMPP) एक प्रस्तावित गहरे समुद्र (डीप-वाटर) प्राकृतिक गैस पाइपलाइन परियोजना है, जिसका उद्देश्य ओमान से भारत तक सीधे गैस आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यह परियोजना लगभग 1600 किलोमीटर लंबी मानी जा रही है और इसे समुद्र तल के अत्यंत गहरे हिस्सों से होकर बिछाने की योजना है।इस परियोजना का मुख्य लक्ष्य भारत को एक वैकल्पिक और सुरक्षित ऊर्जा कॉरिडोर प्रदान करना है, जिससे वह पारंपरिक समुद्री मार्गों और अस्थिर क्षेत्रों पर निर्भरता कम कर सके।
कब शुरू हुई इस प्रोजेक्ट
इस महत्वाकांक्षी परियोजना पर बातचीत 1990 के दशक से ही चल रही है। अलग-अलग समय पर इसे आगे बढ़ाने के प्रयास किए गए, लेकिन भू-राजनीतिक तनाव, तकनीकी चुनौतियां और निवेश की जटिलताओं के कारण यह बार-बार टलता रहा।बाद में साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) ने इस प्रोजेक्ट को पुनर्जीवित करने में अहम भूमिका निभाई। SAGE ने भारत को जोड़ने वाले लगभग 5 अरब डॉलर के समुद्री ऊर्जा कॉरिडोर का भी प्रस्ताव रखा था, जिससे यह योजना फिर से चर्चा में आ गई।
योजना के अनुसार यह पाइपलाइन ओमान के रास अल जिफान (Ras Al Jifan) से शुरू होकर अरब सागर के गहरे समुद्री हिस्सों से गुजरते हुए भारत के गुजरात स्थित पोरबंदर तक पहुंचेगी।
इस मार्ग की सबसे बड़ी चुनौती इसकी गहराई है, क्योंकि यह पाइपलाइन समुद्र तल के नीचे लगभग 3000 से 3500 मीटर की गहराई में बिछाई जानी प्रस्तावित है। यह दुनिया की सबसे जटिल डीप-सी इंजीनियरिंग परियोजनाओं में से एक मानी जाती है।
प्रोजेक्ट का बजट
ओमान–भारत डीप वॉटर पाइपलाइन प्रोजेक्ट (OIDMPP) को एक अत्यंत बड़ा और तकनीकी रूप से जटिल ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट माना जा रहा है, जिसकी अनुमानित लागत लगभग 5 अरब अमेरिकी डॉलर तक आंकी जाती है। हालांकि यह आंकड़ा अंतिम नहीं है, क्योंकि वास्तविक लागत कई तकनीकी, भौगोलिक और रणनीतिक कारकों पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, इस परियोजना की कुल लागत मुख्य रूप से समुद्र की अत्यधिक गहराई और पाइपलाइन बिछाने की जटिल तकनीक पर निर्भर करेगी, क्योंकि यह पाइपलाइन गहरे समुद्री क्षेत्र से होकर गुजरने की योजना है। इसके अलावा समुद्री भू-भाग की कठिन संरचना, उच्च दबाव वाली परिस्थितियां और लंबी दूरी इस परियोजना को और भी चुनौतीपूर्ण बनाती हैं। इसके साथ ही सुरक्षा ढांचे की लागत भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी, क्योंकि समुद्री मार्गों पर संभावित जोखिमों से पाइपलाइन की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी होगा। अंतरराष्ट्रीय सहयोग, निवेश मॉडल और तकनीकी साझेदारी भी इस प्रोजेक्ट के कुल बजट को प्रभावित कर सकते हैं। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह परियोजना केवल एक सामान्य पाइपलाइन नहीं, बल्कि एक हाई-टेक और हाई-रिस्क इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट है, जिसमें अत्याधुनिक इंजीनियरिंग, समुद्री तकनीक और लंबे समय तक चलने वाली रखरखाव व्यवस्था की आवश्यकता होगी। यही कारण है कि इसे भारत की ऊर्जा रणनीति के सबसे महत्वाकांक्षी और चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट्स में से एक माना जाता है।
ओमान–भारत डीप वॉटर पाइपलाइन प्रोजेक्टt (OIDMPP) को अगर भविष्य में लागू किया जाता है, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के लिए कई स्तरों पर बड़े फायदे दे सकता है। सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि भारत को प्राकृतिक गैस की सीधी और स्थिर आपूर्ति मिल सकेगी, जिससे सप्लाई चेन में किसी तरह की बाधा या अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर बहुत कम हो जाएगा। इस परियोजना से भारत की निर्भरता Strait of Hormuz जैसे संवेदनशील और अस्थिर समुद्री मार्गों पर काफी हद तक कम हो जाएगी। इसका मतलब यह होगा कि युद्ध, प्रतिबंध या समुद्री संकट की स्थिति में भी भारत की ऊर्जा आपूर्ति सुरक्षित बनी रहेगी।
ईंधन आपूर्त
इसके अलावा, पाइपलाइन के जरिए गैस की आपूर्ति होने से LNG (Liquefied Natural Gas) के आयात पर आने वाला भारी खर्च कम हो सकता है, क्योंकि जहाजों के माध्यम से होने वाले ट्रांसपोर्ट, बीमा और लॉजिस्टिक्स लागत की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे देश के ऊर्जा आयात बिल में बड़ी बचत की संभावना बनती है। यह परियोजना बिजली उत्पादन और औद्योगिक क्षेत्रों के लिए भी बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है, क्योंकि स्थिर और सस्ती गैस आपूर्ति से पावर प्लांट्स की दक्षता बढ़ेगी और उत्पादन लागत कम होगी। इससे उद्योगों को स्थिर ऊर्जा मिलेगी, जिससे मैन्युफैक्चरिंग और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। दीर्घकालिक रूप से यह परियोजना भारत को ऊर्जा आयातक देश से एक अधिक सुरक्षित और रणनीतिक ऊर्जा शक्ति में बदलने की क्षमता रखती है। साथ ही यह “ऊर्जा आत्मनिर्भरता” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है, जिससे भारत की वैश्विक ऊर्जा राजनीति में स्थिति और मजबूत होगी।
