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पेट्रोल-डीजल की कीमते फिर बढ़ी
पेट्रोल-डीजल की कीमते फिर बढ़ी
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महंगाई का डबल अटैक : 5 दिनों में दूसरी बार बढ़े पेट्रोल-डीजल के दाम, जानें क्यों जेब ढीली करने को मजबूर हुईं तेल कंपनियां

देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 19 मई से औसतन 90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी गई है। पिछले पांच दिनों में यह दूसरी बड़ी बढ़ोतरी है, जिससे ईंधन करीब ₹4 प्रति लीटर महंगा हो चुका है। कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव को इसका मुख्य कारण बताया जा रहा है। बढ़ी हुई ईंधन कीमतों का असर अब सब्जियों, राशन, खेती, परिवहन और आम लोगों के मासिक बजट पर पड़ने की आशंका है।

कीर्तिमान न्यूज
19 May 2026, 09:55 AM
नई दिल्ली

देश के आम आदमी की जेब पर महंगाई का बोझ एक बार फिर बढ़ गया है। सरकारी तेल कंपनियों ने आज, 19 मई से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में औसतन 90-90 पैसे प्रति लीटर की बढ़ोतरी कर दी है। ईंधन के दामों में बीते पांच दिनों के भीतर यह दूसरा बड़ा झटका है। इससे पहले पिछले शुक्रवार (15 मई) को ही पेट्रोल-डीजल की कीमतों में ₹3 प्रति लीटर का भारी इजाफा किया गया था। इस तरह महज पांच दिनों में ईंधन ₹4 के करीब महंगा हो चुका है।

आपकी जेब और रसोई पर कैसे असर डालेगी यह बढ़ोतरी?

ईंधन की कीमतों में हुए इस इजाफे का सीधा असर आम जनता के बजट पर पड़ने वाला है। इसके मुख्य प्रभाव निम्नलिखित क्षेत्रों पर दिखेंगे:

  • सब्जियां और राशन होंगे महंगे (मालभाड़ा वृद्धि): डीजल महंगा होने से ट्रक और टेम्पो ऑपरेटरों का परिचालन खर्च बढ़ेगा। मालभाड़े में बढ़ोतरी के कारण दूसरे राज्यों से आने वाले फल, सब्जियां, दालें और राशन की कीमतें बढ़नी तय हैं।

  • खेती की लागत में इजाफा: भारतीय कृषि काफी हद तक डीजल पर निर्भर है। ट्रैक्टर, थ्रेशर और पंपिंग सेट चलाने के लिए किसानों को अब ज्यादा पैसे खर्च करने होंगे, जिससे आने वाले समय में अनाज की उत्पादन लागत बढ़ जाएगी।

  • सफर होगा महंगा (बस-ऑटो का किराया): सार्वजनिक परिवहन, ऑटो-टैक्सी और स्कूल बसों के किराए में भी बढ़ोतरी की आशंका है, जिससे नौकरीपेशा और छात्रों का मासिक बजट बिगड़ेगा।

$70 से $100 के पार पहुंचा क्रूड ऑयल

दाम बढ़ने की असली वजह क्या है?

इस बढ़ोतरी का मुख्य कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में आया भयंकर उछाल है। पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव (विशेषकर ईरान और अमेरिका के बीच जंग के हालात) शुरू होने से पहले कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास थी। लेकिन मौजूदा संकट के बाद यह 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी है।

क्रूड की आसमान छूती कीमतों के कारण भारतीय तेल कंपनियां भारी दबाव में थीं। पेट्रोलियम मंत्रालय की जॉइंट सेक्रेटरी सुजाता शर्मा के अनुसार, सरकारी कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर हर महीने करीब ₹30,000 करोड़ का भारी नुकसान हो रहा था। इसी घाटे की भरपाई के लिए कंपनियों को दाम बढ़ाने का कड़ा कदम उठाना पड़ा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी बनी रही, तो आने वाले दिनों में ईंधन और महंगा हो सकता है।

बेस प्राइस से 4 गुना तक कैसे बढ़ जाती है कीमत?

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90% कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत और डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति के आधार पर हर दिन सुबह 6 बजे 'डेली प्राइस रिवीजन' (डायनेमिक प्राइसिंग सिस्टम) के तहत नए रेट तय होते हैं। रिफाइनरी से निकलकर आपके वाहन की टंकी तक पहुँचने में तेल की कीमत में ये 5 कड़ियां जुड़ती हैं:
क्रमचरणविवरण
1कच्चे तेल की कीमत (Base Price)अंतरराष्ट्रीय बाजार से प्रति बैरल के हिसाब से खरीदी गई मूल लागत।
2रिफाइनिंग और कंपनियों का चार्जक्रूड को साफ करने की लागत और तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) का मुनाफा।
3केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटीकेंद्र सरकार द्वारा लगाया जाने वाला उत्पाद शुल्क और रोड सेस (जो पूरे देश में समान होता है)।
4डीलर कमीशनपेट्रोल पंप मालिकों को मिलने वाला निश्चित कमीशन (पेट्रोल और डीजल के लिए अलग-अलग)।
5राज्य सरकार का वैट (VAT)सबसे आखिरी में लगने वाला लोकल सेल्स टैक्स। हर राज्य की वैट दरें अलग होने के कारण दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में कीमतें बदल जाती हैं।

राजनीतिक संवेदनशीलता बनाम आर्थिक मजबूरी

  • पड़ोसी देशों में पहले ही बढ़ चुके थे दाम: सरकार का तर्क रहा है कि पश्चिम एशिया संकट के चलते पाकिस्तान, नेपाल और श्रीलंका जैसे देशों में ईंधन की कीमतें पहले ही 15% से 20% तक बढ़ गई थीं, लेकिन भारत में उपभोक्ताओं को लंबे समय तक इससे बचाकर रखा गया।

  • चुनाव के बाद खत्म हुई राहत: देश में मार्च 2024 से पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर थीं। यहां तक कि लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले सरकार ने कीमतों में ₹2 प्रति लीटर की कटौती कर जनता को राहत भी दी थी। तकनीकी रूप से तेल कंपनियां हर दिन रेट बदलने के लिए स्वतंत्र हैं, लेकिन राजनीतिक संवेदनशीलता के कारण इन्हें रोककर रखा गया था, जिससे कंपनियों का घाटा बढ़ता गया।

  • एक्साइज ड्यूटी में कटौती का दांव भी पड़ा कम: इससे पहले केंद्र सरकार ने कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए स्पेशल एक्साइज ड्यूटी में 10-10 रुपये की कटौती की थी। पेट्रोल पर कुल सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी को ₹21.90 से घटाकर ₹11.90 और डीजल पर ₹17.8 से घटाकर ₹7.8 कर दिया गया था। इस राहत के बावजूद, अंतरराष्ट्रीय बाजार के अभूतपूर्व दबाव के आगे अब यह कटौती भी नाकाफी साबित हो रही है।

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