उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के शांत और गहरे जंगलों में इन दिनों एक ऐसा फैसला आकार ले रहा है। जिसने वन्यजीव संरक्षण की पूरी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है। छत्तीसगढ़ के राजकीय पशु वन भैंसा को बचाने की कोशिशों के बीच वन विभाग ने छोटू नामक एक बूढ़े, अंधे और बीते 20 वर्षों से कैद वन भैंसे को फिर से जंगल में छोड़ने का निर्णय लिया है।
सवाल सीधा और असहज है, क्योंकि इसे वापसी कहें या एक ऐसे जीव को उसके हाल पर छोड़ देने की तैयारी, जो अब खुद अपने लिए खड़ा भी नहीं हो सकता। खैर, 12 जनवरी 2026 को हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद तैयार योजना के मुताबिक असम से लाई गई तीन मादा वन भैंसों को बारनवापारा से उदंती लाया जाएगा। इन्हें 45 दिनों तक छोटू के साथ एक बाड़े में रखा जाएगा और फिर रेडियो कॉलर लगाकर जंगल में छोड़ दिया जाएगा।
उद्देश्य स्पष्ट है कि छोटू के जरिए प्रजनन कराकर वन भैंसों की संख्या बढ़ाना। लेकिन 2023 में वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पहले ही यह संकेत दे चुकी है कि छोटू की प्रजनन क्षमता सफल नहीं रही। ऐसे में यह योजना उम्मीद से ज्यादा औपचारिकता जैसी नजर आने लगती है। इस पूरी कवायद के बीच सबसे बड़ा सवाल अब भी अनुत्तरित है कि बारनवापारा में वर्षों से कैद अन्य वन भैंसों और उनके बच्चों का क्या होगा। विभाग 2030 तक हर साल असम से वन भैंसे लाने की योजना बना रहा है, लेकिन मौजूदा पशुओं के भविष्य पर कोई स्पष्टता नहीं है। क्या छोटू की तरह उन्हें भी किसी प्रयोग का हिस्सा बनाया जाएगा, या उनके लिए कोई अलग और संवेदनशील योजना तैयार की जाएगी।
छोटू की कहानी दरअसल एक वन्यजीव की नहीं, उस सोच की कहानी बन गई है जहां संरक्षण और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बार-बार डगमगाता नजर आता है। यह फैसला अगर उसे सम्मानजनक जीवन देने की कोशिश है, तो उसकी तैयारी कहीं नजर नहीं आती। और अगर यह उसे धीरे-धीरे व्यवस्था से बाहर करने की प्रक्रिया है, तो यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है। उदंती के जंगल अब सिर्फ एक सॉफ्ट रिलीज योजना के गवाह नहीं हैं, बल्कि उस फैसले के भी, जो तय करेगा कि हम संरक्षण के नाम पर सच में बचा क्या रहे हैं।
छोटू की आंखों में रोशनी नहीं
छोटू की कहानी अपने आप में एक लंबा विरोधाभास है। 2002 में जन्मा यह वन भैंसा सिर्फ चार साल तक जंगल में रहा, फिर 2006 में बिना किसी स्पष्ट आदेश के उसे कैद कर लिया गया। आज, 25 साल की उम्र में वह बूढ़ा है और अपनी आंखों की रोशनी भी खो चुका है। उसका जीवन अब पूरी तरह मानवीय देखरेख पर निर्भर है। भोजन से लेकर सुरक्षा तक। ऐसे में उसे अचानक जंगल में छोड़ देना, क्या सच में स्वतंत्रता है या एक असंभव परीक्षा।
रणनीति से ज्यादा असमंजस
वन्यजीव विशेषज्ञ नितिन सिंघवी इस पूरे प्रयास को लेकर सख्त सवाल उठाते हैं। उनके मुताबिक, बीते दो दशकों में वन विभाग वन भैंसों के संरक्षण से ज्यादा प्रयोग करता नजर आया है। क्लोन दीप आशा से लेकर हाइब्रिड बताकर बाहर किए गए बछड़ों तक, कई फैसले ऐसे रहे हैं जो रणनीति से ज्यादा असमंजस का संकेत देते हैं। यही कारण है कि छोटू को लेकर लिया गया यह निर्णय भी भरोसे से ज्यादा संशय पैदा करता है।
जोखिम में छोटू का जीवन
व्यावहारिक स्तर पर भी यह योजना कई कमजोरियों से भरी दिखती है। एक अंधा और कमजोर नर जंगल में न तो भोजन तलाश सकता है, न दिशा पहचान सकता है। संभावना यही है कि वह बाड़े के आसपास ही भटकता रह जाएगा, जबकि मादा वन भैंसे आगे निकल जाएंगी। ऐसे में प्रजनन का मूल उद्देश्य तो कमजोर पड़ता ही है, साथ ही छोटू का जीवन भी जोखिम में आ जाता है। उदंती के जंगलों में बाघों की मौजूदगी इस खतरे को और बढ़ा देती है।
