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डिजिटल ब्लैकआउट की आहट :  तेल के बाद अब दुनिया के इंटरनेट पर मंडराया संकट, ईरान की नजरों में समुद्र के नीचे बिछा डेटा नेटवर्क

मध्य पूर्व में जारी तनाव अब सिर्फ मिसाइलों और तेल सप्लाई तक सीमित नहीं रह गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान से जुड़े रणनीतिक हलकों की नजर अब स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के नीचे गुजरने वाली अंडरसी इंटरनेट केबल्स पर है, जिनसे दुनिया का 95% से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रैफिक चलता है। अगर इन केबल्स को नुकसान पहुंचता है, तो इंटरनेट स्पीड, बैंकिंग, सोशल मीडिया, क्लाउड सर्विसेज और AI सिस्टम्स पर वैश्विक असर पड़ सकता है।

कीर्तिमान न्यूज
18 May 2026, 11:16 AM
📍 विदेश डेस्क

दुनिया का मध्य पूर्व (Middle East) हिस्सा इस वक्त एक ऐसे सुलगते ज्वालामुखी की तरह है, जहां तनाव खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले कई महीनों से जारी यह गतिरोध कम होने के बजाय लगातार गहराता जा रहा है। शांति की तमाम अंतरराष्ट्रीय कोशिशें अब तक नाकाम साबित हुई हैं। लेकिन अब यह संकट सिर्फ मिसाइलों, ड्रोनों और कच्चे तेल की सप्लाई रुकने तक सीमित नहीं है।

तेल संकट से जूझ रही दुनिया के सामने अब एक और अभूतपूर्व खतरा आकर खड़ा हो गया है। वैश्विक राजनीति के अखाड़े में अब डिजिटल नेटवर्क को नया हथियार बनाने की तैयारी चल रही है, जिससे पूरी दुनिया में इंटरनेट ब्लैकआउट या भारी मंदी का खतरा पैदा हो गया है।

क्या है ईरान का नया 'डेटा गेम'?

ताजा मीडिया रिपोर्ट्स और खुफिया आकलनों के मुताबिक, ईरान और उससे जुड़े रणनीतिक हलकों की नजर अब उन अंडरसी इंटरनेट केबल्स (Subsea Internet Cables) पर है, जो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) के नीचे से गुजरती हैं।

  • महाद्वीपों का डिजिटल लिंक: ये फाइबर ऑप्टिक केबल्स कोई साधारण तार नहीं हैं, बल्कि ये एशिया, यूरोप और खाड़ी देशों के बीच करोड़ों-अरबों लोगों के इंटरनेट और डेटा ट्रैफिक की लाइफलाइन हैं।

  • टैक्स और दबाव की रणनीति: ईरान समर्थित कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म्स और थिंक-टैंक्स ने हाल ही में संकेत दिए हैं कि इन केबल्स पर या तो भारी टैक्स लगाया जा सकता है, या फिर पश्चिमी देशों और बड़ी टेक कंपनियों पर भू-राजनीतिक दबाव बनाने के लिए इन्हें निशाना बनाया जा सकता है।

  • टेक दिग्गजों में खलबली: इस खबर के सामने आते ही गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा और वैश्विक टेलीकॉम कंपनियों समेत दुनिया भर की सरकारों की चिंताएं सातवें आसमान पर पहुंच गई हैं।

क्यों इतनी अहम हैं ये केबल्स

विशेषज्ञों का कहना है कि आज की आधुनिक दुनिया पूरी तरह से समुद्र के नीचे बिछे इस अदृश्य जाल पर टिकी है। वैश्विक स्तर पर होने वाले इंटरनेशनल इंटरनेट ट्रैफिक का 95% से अधिक हिस्सा इन्हीं फाइबर ऑप्टिक केबल्स के जरिए ट्रांसफर होता है। इसके दायरे में निम्नलिखित चीजें आती हैं:

  • वैश्विक बैंकिंग ट्रांजैक्शन और शेयर बाजार।

  • क्लाउड स्टोरेज और क्रिटिकल सरकारी डेटा।

  • वीडियो कॉलिंग, OTT प्लेटफॉर्म्स, सोशल मीडिया।

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का रीयल-टाइम डेटा प्रोसेसिंग।

अगर केबल्स को नुकसान पहुंचा, तो आप पर क्या होगा असर?

अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के पास मौजूद इन केबल्स को जरा भी नुकसान पहुंचता है, तो इसका असर केवल मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा। यह एक ऐसा ग्लोबल डोमिनो इफेक्ट (वैश्विक असर) पैदा करेगा जो आपके स्मार्टफोन से लेकर देश की अर्थव्यवस्था को हिला देगा:

प्रभावित क्षेत्रसंभावित असर और नुकसान
आम इंटरनेट यूजरइंटरनेट स्पीड कछुए की रफ्तार जैसी हो जाएगी। WhatsApp, Instagram, Netflix और YouTube जैसी सेवाएं ठप या बेहद धीमी हो सकती हैं।
वित्तीय सेक्टरऑनलाइन बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट्स और स्टॉक मार्केट्स में भारी रुकावट आएगी, जिससे अरबों डॉलर का नुकसान हो सकता है।
टेक और AIक्लाउड सर्वर डाउन हो सकते हैं और आधुनिक AI सिस्टम्स का रिस्पॉन्स टाइम बहुत बढ़ जाएगा।
भारत पर सीधा असरभारत का आईटी (IT) और आउटसोर्सिंग सेक्टर पूरी दुनिया को सेवाएं देता है। अंतरराष्ट्रीय डेटा ट्रांसफर में देरी होने से भारत के टेक उद्योग को तगड़ा झटका लग सकता है।

युद्ध के बीच 'इंटरनेट' को ठीक करना नामुमकिन!

विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि समुद्र के अंदर मौजूद इन केबल्स की मरम्मत करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए विशेष जहाजों और डीप-सी डाइविंग रोबोट्स की जरूरत होती है।

सबसे बड़ा खतरा: समुद्र के नीचे खराबी वाली जगह को ढूंढने और उसे ठीक करने में कई हफ्तों या महीनों का समय लग सकता है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि युद्ध या भारी सैन्य तनाव की स्थिति बनी रही, तो कोई भी मरम्मत करने वाला जहाज उस इलाके में जाने का जोखिम नहीं उठाएगा।

डिजिटल भू-राजनीति का नया दौर

यह पूरा घटनाक्रम यह साफ करता है कि आने वाले समय में युद्ध सिर्फ जमीनों और सीमाओं पर नहीं, बल्कि डेटा और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर लड़े जाएंगे। तेल की सप्लाई को रोकना बीसवीं सदी का हथियार था, लेकिन इक्कीसवीं सदी में डिजिटल नेटवर्क को बंधक बनाना दुनिया को घुटनों पर लाने का सबसे नया और खतरनाक पैंतरा बनता जा रहा है। फिलहाल, दुनिया भर की सुरक्षा एजेंसियां और टेक कंपनियां इस पूरे रूट पर पैनी नजर रखे हुए हैं।
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