महिलाओं में तेजी से सामने आने वाली पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम यानी PCOS को लेकर चिकित्सा जगत में बड़ा बदलाव हुआ है। अब इस स्थिति को नया नाम पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम यानी PMOS दिया गया है। यह बदलाव इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि लंबे समय तक PCOS को केवल ओवरी या पीरियड्स से जुड़ी समस्या समझा जाता रहा, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि यह बीमारी हार्मोन, मेटाबॉलिज्म, त्वचा, मानसिक स्वास्थ्य और प्रजनन क्षमता—कई स्तरों पर असर डालती है।
द लैंसेट में प्रकाशित नई रिपोर्ट के अनुसार, PCOS अब PMOS के नाम से जाना जाएगा। वैश्विक विशेषज्ञों और स्वास्थ्य संगठनों की पहल के बाद यह बदलाव किया गया है। एंडोक्राइन सोसायटी के अनुसार, यह स्थिति दुनिया भर में करीब 17 करोड़ महिलाओं को प्रभावित करती है और लगभग हर 8 में से 1 महिला इससे प्रभावित हो सकती है।
नाम बदलने की जरूरत क्यों पड़ी
PCOS नाम में “पॉलीसिस्टिक ओवरी” शब्द होने की वजह से लंबे समय तक यह भ्रम बना रहा कि यह बीमारी केवल ओवरी में सिस्ट बनने से जुड़ी है। लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार कई महिलाओं में ओवरी में सिस्ट दिखे बिना भी यह स्थिति हो सकती है। इसी कारण कई मामलों में जांच और इलाज में देरी होती थी। नए नाम PMOS में “पॉलीएंडोक्राइन” और “मेटाबॉलिक” शब्द जोड़े गए हैं, ताकि यह साफ हो सके कि यह शरीर की कई हार्मोनल ग्रंथियों और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी स्थिति है। इसमें इंसुलिन रेजिस्टेंस, वजन बढ़ना, टाइप-2 डायबिटीज का खतरा, अनियमित पीरियड्स, मुंहासे, चेहरे या शरीर पर अनचाहे बाल और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं शामिल हो सकती हैं।
PMOS क्या है
PMOS एक हार्मोनल और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर है, जिसमें महिलाओं के शरीर में एंड्रोजन यानी पुरुष हार्मोन का स्तर सामान्य से ज्यादा हो सकता है। इससे ओव्यूलेशन यानी अंडा बनने और निकलने की प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। इसी कारण पीरियड्स अनियमित हो सकते हैं और गर्भधारण में परेशानी आ सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, PCOS/PMOS एक क्रॉनिक मेटाबॉलिक स्थिति है, जिसका संबंध इंसुलिन रेजिस्टेंस, मोटापा और टाइप-2 डायबिटीज के बढ़े जोखिम से भी होता है। WHO यह भी कहता है कि इसका कोई स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन लाइफस्टाइल बदलाव, दवाओं और फर्टिलिटी ट्रीटमेंट से लक्षणों को नियंत्रित किया जा सकता है।
यह बीमारी क्यों होती है
PMOS का एक ही निश्चित कारण अभी तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। विशेषज्ञों के अनुसार इसके पीछे कई कारण मिलकर काम कर सकते हैं। सबसे बड़ा कारण इंसुलिन रेजिस्टेंस माना जाता है। जब शरीर इंसुलिन का सही इस्तेमाल नहीं कर पाता, तो ब्लड शुगर और हार्मोनल संतुलन प्रभावित होता है। इससे एंड्रोजन हार्मोन बढ़ सकते हैं। दूसरा कारण जेनेटिक फैक्टर है। जिन महिलाओं के परिवार में पहले से PCOS/PMOS या टाइप-2 डायबिटीज की हिस्ट्री होती है, उनमें इसका खतरा ज्यादा हो सकता है। WHO के अनुसार परिवार में PCOS या टाइप-2 डायबिटीज का इतिहास होने पर जोखिम बढ़ सकता है।
इसके अलावा वजन बढ़ना, अनियमित जीवनशैली, कम शारीरिक गतिविधि, तनाव, खराब नींद और गलत खानपान भी इसके लक्षणों को बढ़ा सकते हैं।
इसके प्रमुख लक्षण क्या हैं
PMOS के लक्षण हर महिला में अलग-अलग हो सकते हैं। कुछ महिलाओं में हल्के लक्षण होते हैं, जबकि कुछ में यह स्थिति गंभीर रूप ले सकती है। सबसे आम लक्षणों में अनियमित पीरियड्स, लंबे समय तक पीरियड्स न आना, बहुत ज्यादा या बहुत कम ब्लीडिंग, चेहरे या शरीर पर अनचाहे बाल, मुंहासे, बाल झड़ना, वजन बढ़ना, त्वचा का काला पड़ना, थकान, मूड स्विंग, चिंता, डिप्रेशन और गर्भधारण में परेशानी शामिल हैं। PCOS में अनियमित माहवारी, अधिक बाल आना, मुंहासे और इंफर्टिलिटी जैसे लक्षण हो सकते हैं। इस स्थिति में डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याओं का जोखिम भी बढ़ सकता है।
जांच कैसे होती है
PMOS/PCOS की जांच केवल अल्ट्रासाउंड देखकर नहीं की जानी चाहिए। पहले कई बार ओवरी में सिस्ट दिखने या न दिखने के आधार पर भ्रम पैदा हो जाता था। 2023 की अंतरराष्ट्रीय गाइडलाइन के अनुसार, निदान के लिए डॉक्टर आमतौर पर तीन बातों को देखते हैं—अनियमित ओव्यूलेशन या पीरियड्स, एंड्रोजन हार्मोन के बढ़े संकेत या टेस्ट रिपोर्ट, और ओवरी से जुड़े संकेत जैसे अल्ट्रासाउंड या AMH स्तर। किशोरियों में जांच और सावधानी से की जाती है, क्योंकि उम्र के शुरुआती वर्षों में पीरियड्स का अनियमित होना सामान्य भी हो सकता है।
क्या इससे गर्भधारण संभव है
यह एक बड़ा भ्रम है कि PMOS होने पर महिला मां नहीं बन सकती। कई महिलाओं को ओव्यूलेशन में दिक्कत के कारण गर्भधारण में देरी हो सकती है, लेकिन सही इलाज, वजन नियंत्रण, दवाओं और फर्टिलिटी उपचार से गर्भधारण की संभावना बढ़ाई जा सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार PMOS में फर्टिलिटी से जुड़ी परेशानी को समय पर पहचानकर इलाज किया जाए तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
इससे कैसे बचा जा सकता है
PMOS को पूरी तरह रोकने का कोई निश्चित तरीका नहीं है, क्योंकि इसमें जेनेटिक और हार्मोनल कारण भी शामिल होते हैं। लेकिन इसके लक्षणों और लंबे समय के जोखिमों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। सबसे जरूरी है नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, वजन नियंत्रण, पर्याप्त नींद और तनाव कम करना। जिन महिलाओं का वजन अधिक है, उनमें वजन कम करने से पीरियड्स नियमित होने, इंसुलिन रेजिस्टेंस कम होने और हार्मोन संतुलन में मदद मिल सकती है। NHS के अनुसार अधिक वजन वाली महिलाओं में वजन घटाने से PCOS के लक्षण और लंबे समय के स्वास्थ्य जोखिमों में सुधार हो सकता है।
खानपान में क्या बदलाव जरूरी
PMOS में हाई-फाइबर खाना, प्रोटीन, साबुत अनाज, फल, सब्जियां, दालें, नट्स और कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स वाले भोजन को प्राथमिकता दी जाती है। बहुत ज्यादा मीठा, प्रोसेस्ड फूड, तली चीजें और मीठे पेय पदार्थों से बचना बेहतर माना जाता है। हालांकि किसी एक डाइट को सभी के लिए सबसे अच्छा नहीं माना जा सकता। 2025 की समीक्षा में भी कहा गया कि PCOS/PMOS के इलाज में लाइफस्टाइल, वजन प्रबंधन, डाइट और दवाओं का संयुक्त असर महत्वपूर्ण होता है।
क्या इसका स्थायी इलाज है
WHO और Mayo Clinic दोनों के अनुसार PCOS/PMOS का स्थायी इलाज नहीं है, लेकिन इसे मैनेज किया जा सकता है। सही जांच, डॉक्टर की सलाह, दवा, नियमित फॉलोअप और जीवनशैली में बदलाव से इसके लक्षणों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
महिलाओं के लिए जरूरी सलाह
डॉक्टरों का कहना है कि अनियमित पीरियड्स, अचानक वजन बढ़ना, मुंहासे, चेहरे पर बाल, बाल झड़ना या गर्भधारण में परेशानी जैसे लक्षणों को सामान्य मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। समय पर गायनेकोलॉजिस्ट या एंडोक्राइनोलॉजिस्ट से सलाह लेना जरूरी है। PMOS का नया नाम महिलाओं को यह समझाने की कोशिश है कि यह सिर्फ “ओवरी में सिस्ट” की समस्या नहीं है, बल्कि पूरे शरीर के हार्मोन और मेटाबॉलिज्म से जुड़ी स्थिति है। सही समय पर पहचान और इलाज से महिलाएं सामान्य, स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकती हैं।

