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मोबाइल फोन और बच्चे
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मोबाइल फोन : घंटों मोबाइल चला रहे बच्चे, मानसिक और शारीरिक विकास पर पड़ रहा बुरा असर

मोबाइल फोन का बढ़ता इस्तेमाल बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गंभीर असर डाल रहा है। WHO और कई अंतरराष्ट्रीय रिसर्च के अनुसार जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों में बोलने में देरी, ध्यान की कमी, नींद की समस्या, चिड़चिड़ापन, मोटापा और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि मोबाइल और सोशल मीडिया की लत बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर कर रही है, जिससे उनका व्यवहार और आत्मविश्वास भी प्रभावित हो रहा है। ऐसे में अभिभावकों को बच्चों का स्क्रीन टाइम सीमित करने, आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा देने और घर में डिजिटल अनुशासन लागू करने की जरूरत है।

कीर्तिमान नेटवर्क
13 May 2026, 08:33 PM
📍 नई दिल्ली
आज का दौर पूरी तरह डिजिटल हो चुका है। मोबाइल फोन अब सिर्फ बातचीत का माध्यम नहीं रह गया, बल्कि मनोरंजन, पढ़ाई, सोशल मीडिया और गेमिंग का सबसे बड़ा साधन बन चुका है। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर दिखाई दे रहा है। छोटे-छोटे बच्चे घंटों मोबाइल स्क्रीन से चिपके रहते हैं। कई घरों में बच्चों को खाना खिलाने, शांत कराने या व्यस्त रखने के लिए मोबाइल दे दिया जाता है। धीरे-धीरे यही आदत लत में बदलने लगती है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार मोबाइल का इस्तेमाल बच्चों के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास पर गंभीर असर डाल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने बच्चों के स्क्रीन टाइम को लेकर स्पष्ट गाइडलाइन जारी की है। WHO के अनुसार एक साल से कम उम्र के बच्चों को किसी भी प्रकार की स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना चाहिए। वहीं 2 से 4 साल तक के बच्चों के लिए दिन में अधिकतम एक घंटा स्क्रीन टाइम ही उचित माना गया है। विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों के स्वस्थ विकास के लिए मोबाइल से ज्यादा जरूरी पर्याप्त नींद, खेलकूद, शारीरिक गतिविधियां और परिवार के साथ समय बिताना है। डॉक्टरों का कहना है कि वर्तमान समय में बच्चों का वास्तविक खेल-कूद कम होता जा रहा है। पहले जहां बच्चे मैदानों में खेलते थे, अब वे मोबाइल स्क्रीन पर गेम खेलने में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं। इसका असर उनके शारीरिक विकास और सामाजिक व्यवहार दोनों पर पड़ रहा है।

बोलने और सीखने की क्षमता पर असर

मोबाइल के अत्यधिक इस्तेमाल को लेकर दुनियाभर में कई शोध किए गए हैं और इनके परिणाम बेहद चिंताजनक हैं। JAMA Pediatrics में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया कि कम उम्र में ज्यादा स्क्रीन टाइम लेने वाले बच्चों में बोलने, संवाद करने और समस्या सुलझाने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। रिसर्च के अनुसार रोजाना 4 घंटे या उससे ज्यादा मोबाइल देखने वाले बच्चों में विकास संबंधी देरी का खतरा अधिक देखा गया।विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों का दिमाग बातचीत और वास्तविक अनुभवों से तेजी से सीखता है। लेकिन जब बच्चा लंबे समय तक मोबाइल स्क्रीन देखता है, तो उसका संवाद परिवार और आसपास के लोगों से कम होने लगता है। यही कारण है कि कई बच्चों में बोलने में देरी और भाषा सीखने की क्षमता कमजोर पड़ रही है।

भाषा विकास पर गंभीर असर

2024 में प्रकाशित एक अंतरराष्ट्रीय समीक्षा में सामने आया कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों की भाषा सीखने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है। मोबाइल देखने वाले बच्चे माता-पिता और परिवार के अन्य लोगों से कम बातचीत करते हैं। इससे शब्द सीखने, भाव समझने और अपनी बात व्यक्त करने की क्षमता प्रभावित होती है। विशेषज्ञों के अनुसार शुरुआती उम्र में बच्चों के लिए इंसानी बातचीत सबसे ज्यादा जरूरी होती है। मोबाइल स्क्रीन बच्चों को व्यस्त तो रखती है, लेकिन भावनात्मक और सामाजिक जुड़ाव नहीं दे पाती। यही कारण है कि कई बच्चों में सामाजिक व्यवहार कमजोर होता जा रहा है।

नींद पर पड़ रहा गहरा असर

देर रात तक स्क्रीन देखने से बिगड़ रही दिनचर्या मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी  बच्चों की नींद को बुरी तरह प्रभावित करती है। देर रात तक वीडियो देखने और गेम खेलने की वजह से बच्चों की नींद पूरी नहीं हो पाती। डॉक्टरों का कहना है कि पर्याप्त नींद न मिलने से बच्चों का मानसिक और शारीरिक विकास प्रभावित हो सकता है। नींद की कमी के कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा, थकान और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी बढ़ने लगती है। कई बच्चों की पढ़ाई पर भी इसका सीधा असर दिखाई देता है। लगातार स्क्रीन देखने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता, जिससे तनाव और मानसिक थकान बढ़ सकती है।

सोशल मीडिया बच्चों को बना रहा मानसिक रूप से कमजोर किशोरों में बढ़ रही चिंता और अवसाद की समस्या

किशोर बच्चों में मोबाइल और सोशल मीडिया की लत मानसिक स्वास्थ्य के लिए और भी खतरनाक साबित हो रही है। The Lancet सहित कई अंतरराष्ट्रीय शोधों में यह बात सामने आई है कि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों और किशोरों में चिंता, अवसाद, अकेलापन और आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार सोशल मीडिया पर लगातार दूसरों की जिंदगी देखने से बच्चों में तुलना की भावना बढ़ती है। वे खुद को दूसरों से कम समझने लगते हैं, जिससे मानसिक दबाव और असंतोष पैदा होता है। कई बच्चे वास्तविक दुनिया से कटकर ऑनलाइन दुनिया में ज्यादा समय बिताने लगते हैं, जिसका असर उनके व्यवहार और रिश्तों पर भी पड़ता है।

 स्कूलों में मोबाइल पर क्यों लग रही रोक

 UNESCO रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता

मोबाइल के बढ़ते दुष्प्रभाव को देखते हुए कई देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगानी शुरू कर दी है। यूनेस्को की रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 114 शिक्षा तंत्रों में स्कूलों के भीतर मोबाइल फोन पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिबंध लागू किया जा चुका है। शिक्षकों का मानना है कि मोबाइल के कारण बच्चों का पढ़ाई से ध्यान भटकता है। क्लासरूम में बच्चे पढ़ाई के बजाय सोशल मीडिया, वीडियो और गेम में ज्यादा रुचि लेने लगते हैं। इससे उनकी एकाग्रता और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है।

 बच्चों पर दिख रहे शारीरिक नुकसान

आंखों से लेकर मोटापे तक बढ़ रहा खतरा विशेषज्ञों के अनुसार जरूरत से ज्यादा मोबाइल चलाने वाले बच्चों में कई तरह की शारीरिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सिरदर्द और धुंधला दिखने जैसी शिकायतें बढ़ रही हैं। लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठे रहने के कारण गर्दन और पीठ दर्द की समस्या भी सामने आ रही है। शारीरिक गतिविधियां कम होने की वजह से बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। डॉक्टरों का कहना है कि आउटडोर खेलों की कमी बच्चों की फिटनेस और रोग प्रतिरोधक क्षमता दोनों को प्रभावित कर रही है।

सामाजिक जीवन पर भी पड़ रहा असर

मोबाइल की लत बच्चों को धीरे-धीरे वास्तविक दुनिया से दूर कर रही है। कई बच्चे परिवार के साथ बैठने या दोस्तों के साथ खेलने के बजाय मोबाइल पर समय बिताना ज्यादा पसंद करने लगे हैं। इससे उनका सामाजिक व्यवहार कमजोर हो रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बचपन में सामाजिक मेलजोल बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए बेहद जरूरी होता है। लेकिन मोबाइल की वजह से बच्चों का संवाद सीमित होता जा रहा है, जिसका असर उनके आत्मविश्वास और व्यवहार पर दिखाई देता है।

अभिभावक के लिए सन्देश 

घर में तय करें डिजिटल अनुशासन विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को अचानक मोबाइल से दूर करना मुश्किल हो सकता है, इसलिए धीरे-धीरे स्क्रीन टाइम कम करना चाहिए। माता-पिता को घर में कुछ नियम तय करने चाहिए। खाने के समय और सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह बंद करना चाहिए। बच्चों को आउटडोर गेम, किताब, संगीत, कहानी और रचनात्मक गतिविधियों में व्यस्त रखना जरूरी है ताकि उनका ध्यान स्क्रीन से हट सके। विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि माता-पिता को खुद भी बच्चों के सामने मोबाइल का सीमित उपयोग करना चाहिए, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे घर में देखते हैं।मोबाइल पूरी तरह खराब नहीं है, लेकिन बिना नियंत्रण के इसका इस्तेमाल बच्चों के भविष्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। सही उम्र, सही समय और सही कंटेंट के साथ सीमित उपयोग ही सुरक्षित माना जाता है। बच्चों को मोबाइल से ज्यादा जरूरत परिवार, खेल, बातचीत और वास्तविक दुनिया से जुड़ने की है। अगर समय रहते स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले समय में यह समस्या बच्चों के मानसिक और सामाजिक विकास के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है।
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