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सिन्धु जल संधि
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सिंधु जल संधि : पाकिस्तान में खेती और पीने के पानी का बढ़ा संकट 

सिंधु जल संधि के निलंबन का असर अब पाकिस्तान में दिखने लगा है। किसानों को सिंचाई और लोगों को पीने के पानी की कमी का सामना करना पड़ रहा है। भारत ने साफ कहा है कि आतंकवाद बंद होने तक संधि बहाल नहीं होगी।

कीर्तिमान नेटवर्क
13 May 2026, 11:59 AM
📍 इस्लामाबाद
सिंधु जल संधि के निलंबन को एक वर्ष से अधिक समय बीत चुका है और अब इसका असर पाकिस्तान में साफ दिखाई देने लगा है। पाकिस्तान के कई हिस्सों में जल संकट गहराने लगा है, जिससे खेती-किसानी के साथ-साथ आम लोगों की जिंदगी भी प्रभावित हो रही है। खासतौर पर पंजाब और सिंध प्रांत के किसान सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलने से चिंतित हैं। 
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि हालात ऐसे ही बने रहे, तो आने वाले महीनों में पाकिस्तान को गंभीर कृषि और पेयजल संकट का सामना करना पड़ सकता है।भारत द्वारा संधि को निलंबित किए जाने के बाद पाकिस्तान की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पहले ही महंगाई, ऊर्जा संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे में जल संकट ने उसकी मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। पाकिस्तान के किसान संगठनों ने सरकार को चेतावनी दी है कि यदि सिंधु नदी प्रणाली से मिलने वाले पानी की उपलब्धता प्रभावित हुई, तो धान, गन्ना और कपास जैसी प्रमुख फसलों की बुवाई बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। 

सिंधु जल संधि क्यों की गई थी

सिंधु जल संधि भारत और पाकिस्तान के बीच नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर बढ़ते विवाद को रोकने के लिए की गई थी। 1947 में देश के विभाजन के बाद सिंधु नदी प्रणाली की कई नदियां भारत से होकर पाकिस्तान जाती थीं, जबकि पाकिस्तान की खेती और पेयजल व्यवस्था काफी हद तक इन्हीं नदियों पर निर्भर थी। पानी के उपयोग को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने लगा था। इसी स्थिति को नियंत्रित करने और भविष्य में जल संकट या संघर्ष की संभावना को कम करने के लिए विश्व बैंक की मध्यस्थता में 1960 में यह संधि हुई। इस समझौते पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु  और पाकिस्तान के राष्ट्रपति Ayub Khan ने हस्ताक्षर किए थे। संधि के तहत भारत को रावी, ब्यास और सतलुज नदियों का नियंत्रण मिला, जबकि सिंधु, झेलम और चिनाब नदियों के अधिकांश जल उपयोग का अधिकार पाकिस्तान को दिया गया। इसका उद्देश्य दोनों देशों के बीच जल विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाना और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना था। 
किसानों पर बढ़ा संकट
पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था काफी हद तक सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियों पर निर्भर है। देश के बड़े हिस्से में सिंचाई का मुख्य स्रोत यही नदी प्रणाली है। लेकिन पिछले एक साल से जल प्रवाह को लेकर बनी अनिश्चितता ने किसानों की चिंता बढ़ा दी है। कई इलाकों में नहरों का जलस्तर कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। किसानों का कहना है कि पानी की कमी के कारण खेतों की सिंचाई समय पर नहीं हो पा रही है। इससे फसलों की पैदावार पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि धान की बुवाई प्रभावित हुई तो पाकिस्तान को खाद्यान्न संकट और महंगाई दोनों का सामना करना पड़ सकता है।

पीने के पानी का संकट भी गहराया

खेती के साथ-साथ अब पाकिस्तान के कई शहरों और ग्रामीण इलाकों में पीने के पानी की समस्या भी बढ़ती दिखाई दे रही है। स्थानीय प्रशासन को पानी की आपूर्ति को लेकर अतिरिक्त इंतजाम करने पड़ रहे हैं। कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिससे आने वाले समय में हालात और गंभीर हो सकते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि पाकिस्तान लंबे समय से जल प्रबंधन की समस्याओं से जूझ रहा है। जल संरक्षण और आधुनिक सिंचाई तकनीकों की कमी ने संकट को और बढ़ाया है। ऐसे में सिंधु जल संधि का निलंबन पाकिस्तान के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है।

भारत ने दोहराया सख्त रुख

भारत ने इस मुद्दे पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए कहा है कि आतंकवाद और सामान्य संबंध एक साथ नहीं चल सकते। भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को “विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय” तरीके से बंद नहीं करता, तब तक संधि को बहाल करने पर विचार नहीं किया जाएगा। भारतीय विदेश मंत्रालय ने हाल ही में दोहराया कि “आतंक और बातचीत साथ नहीं चल सकते, आतंक और व्यापार साथ नहीं चल सकते, और पानी और खून साथ नहीं बह सकते।” भारत का यह बयान पाकिस्तान के लिए स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि सीमा पार आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना किसी प्रकार की रियायत संभव नहीं होगी

बगलिहार बांध बना चर्चा का केंद्र

बगलीहार बाँध भी इस पूरे विवाद के केंद्र में बना हुआ है। चिनाब नदी पर बने इस बांध के फाटकों को लेकर पाकिस्तान लगातार चिंता जताता रहा है। भारत का कहना है कि उसके सभी कदम अंतरराष्ट्रीय नियमों और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप हैं।रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जल संसाधनों को लेकर भारत अब पहले की तुलना में अधिक सख्त नीति अपनाता दिखाई दे रहा है। इससे पाकिस्तान पर राजनीतिक और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ सकते हैं।

पाकिस्तान के सामने बड़ी चुनौती

करीब 25 करोड़ की आबादी वाले पाकिस्तान के लिए जल संकट केवल कृषि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक स्थिरता से भी जुड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। यदि आने वाले समय में बारिश सामान्य से कम हुई और जल प्रबंधन में सुधार नहीं हुआ, तो कई क्षेत्रों में सूखे जैसे हालात पैदा हो सकते हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान को केवल भारत पर निर्भर रहने के बजाय अपने जल संरक्षण तंत्र को मजबूत करना होगा। आधुनिक सिंचाई तकनीक, जल भंडारण परियोजनाएं और भूजल संरक्षण जैसे कदम अब उसके लिए बेहद जरूरी हो गए हैं। वहीं भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना सिंधु जल संधि को लेकर किसी नरमी की संभावना फिलहाल दिखाई नहीं देती।  
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