केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE की नई थ्री-लैंग्वेज पॉलिसी को लेकर विवाद गहरा गया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को इस पॉलिसी पर तुरंत रोक लगाने से इनकार कर दिया है। साल 2026-27 के शैक्षणिक सत्र से इसे लागू कर दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई अब बुधवार को तय की गई है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की बेंच इस मुद्दे पर गहराई से विचार कर रही है।
नई नीति के प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति
याचिकाकर्ताओं ने नई नीति के प्रावधानों पर गंभीर आपत्ति जताई है। नई पॉलिसी के तहत छात्रों को दो भारतीय भाषाएं पढ़ना अनिवार्य होगा। इस कारण छात्र उन भाषाओं को छोड़ने के लिए मजबूर हो सकते हैं, जिन्हें वे कक्षा 5 से पढ़ रहे हैं। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इससे छात्रों का शैक्षणिक संतुलन बिगड़ सकता है।
अंग्रेजी को लेकर नई बहस
नीति में अंग्रेजी को 'गैर-मूल' भाषा माना गया है, जिसे लेकर भी विरोध हो रहा है। इसके अलावा विशेषज्ञों ने शिक्षकों और पाठ्यपुस्तकों की कमी पर भी चिंता जताई है। CBSE ने 15 मई को एक सर्कुलर जारी कर इसे लागू करने का निर्देश दिया था। याचिकाकर्ताओं की ओर से दिग्गज वकीलों ने कोर्ट में अपनी दलीलें पेश कीं।
नई शिक्षा नीति और संवैधानिक स्थिति
सरकार का मानना है कि यह बदलाव शिक्षा प्रणाली को आधुनिक बनाने के लिए है। इसका उद्देश्य छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान और कौशल सिखाना है। केंद्र सरकार ने इस नीति को 2030 तक पूरी तरह लागू करने का लक्ष्य रखा है। चूँकि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची का विषय है, इसलिए इसमें राज्यों की भी भूमिका अहम है। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच टकराव को सुलझाने के लिए कोर्ट ने आपसी सहमति का सुझाव दिया है।