Chumbak Film Review: कहते हैं कि मकान बदलते वक्त आप अपना आशियाना चुन सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं। अगर पड़ोसी मस्तमौला हों तो जिंदगी आसान लगती है, लेकिन अगर वे हर बात में टांग अड़ाने वाले हों, तो रोज का माहौल एक कॉमेडी शो जैसा बन जाता है। आतिश कपाड़िया और जमनादास मजेठिया की नई कॉमेडी-ड्रामा सीरीज 'चुंबक' (अब नेटफ्लिक्स पर उपलब्ध) इसी सोच पर आधारित है।
कैसी है 'चुंबक' की कहानी ?
कहानी का मुख्य केंद्र है रजनी (नीना गुप्ता) और कुकू मर्चेंट (देवेन भोजानी)। दशकों पुरानी इस शादी में अब मिठास कम और खटास ज्यादा आ चुकी है, बात तलाक तक पहुंच गई है। लेकिन जब मामला एक ऐसे मोहल्ले का हो जहां हर कोई एक-दूसरे के निजी जीवन में दखल देना अपना हक समझता है, तो यह मर्चेंट परिवार का व्यक्तिगत मुद्दा नहीं रह जाता। कॉलोनी वालों की मुफ्त सलाह, गलतफहमियां और बिनबुलाए मेहमान बनकर पहुंच जाना पूरी स्थिति को बेहद हास्यास्पद बना देता है।
इसके साथ ही, रो-हाउस में रहने वाले बाकी परिवार इस ड्रामे में अपने-अपने रंग भरते हैं:
मिकी और ट्विंकल: एक नया-नवेला जोड़ा, जो थोड़ा प्राइवेसी और रोमांस चाहता है, पर पड़ोसियों के इरादे कुछ और ही हैं।
आदित्य और प्रियंका: बाहर से शांत दिखने वाला, लेकिन अंदर से काफी दिलचस्प कपल।
तारापोरवाला परिवार: अपनी अनोखी हरकतों से पूरे माहौल में तड़का लगाने वाला परिवार।
केजरीवाल परिवार: जो इस अफरातफरी में अपना एक अलग ही ड्रामा लेकर आते हैं।
सकारात्मक पक्ष: अदाकारी और भारतीय जीवन की झलक
आतिश कपाड़िया हमेशा से छोटे-छोटे घरेलू मुद्दों को स्क्रीन पर मजेदार तरीके से उतारने के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने भारतीय मोहल्लों के उस विरोधाभास को बखूबी पकड़ा है—जहां पड़ोसी आपकी प्राइवेसी में सबसे बड़े खलनायक होते हैं, लेकिन किसी मुसीबत के वक्त यही सबसे पहले दरवाजे पर खड़े मिलते हैं।नीना गुप्ता का जलवा: रजनी के किरदार में नीना गुप्ता ने कमाल का काम किया है। उनका कॉमिक टाइमिंग बेहद स्वाभाविक है। बिना किसी ओवर-एक्टिंग के, सिर्फ अपने हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज से वे सीन में जान डाल देती हैं।
देवेन भोजानी का साथ: कुकू के रूप में देवेन भोजानी नीना गुप्ता को बराबर की टक्कर देते हैं। उनकी फिजिकल कॉमेडी और नीना गुप्ता का संयम मिलकर एक ऐसा तालमेल बनाते हैं, जो शो को सिर्फ कॉमेडी न रखकर एक भावनात्मक गहराई भी देता है।
सपोर्टिंग कास्ट: अर्जुन बिजलानी और हेली शाह ने आज के युवा जोड़ों की उलझनों को अच्छे से पेश किया है। सुमित व्यास, मानसी पारेख, डेलनाज ईरानी और सुमित राघवन जैसे मंझे हुए कलाकारों की मौजूदगी ने पूरी सीरीज को बांधकर रखा है।
कहां थोड़ी कमजोर रह गई सीरीज ?
'चुंबक' अपनी शुरुआत बहुत मजबूती से करती है, लेकिन धीरे-धीरे कुछ जगह इसकी कॉमेडी दोहराव का शिकार होने लगती है।
चिल्लाचिल्ली का शोर: कई दृश्यों में किरदार एक-दूसरे से ज्यादा जोर से बोलने की होड़ में लग जाते हैं। इससे कॉमेडी का मजा थोड़ा किरकिरा हो जाता है और सीन हास्य के बजाय सिर्फ 'शोरगुल' लगने लगता है।
अनुमानित चुटकुले: कुछ जोक्स पहले से ही समझ आ जाते हैं, जिससे उनका पंच उतना असरदार नहीं रहता। अगर एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई होती, तो कॉमेडी और बेहतर निकलकर आती।

