इस साल गर्मी ने केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के कई बड़े देशों को भी बेहाल कर दिया है। यूरोप, जिसे आमतौर पर ठंडे मौसम वाला महाद्वीप माना जाता है, वहां भी तापमान रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच रहा है। ब्रिटेन की राजधानी लंदन में पिछले कई वर्षों की सबसे गर्म रात दर्ज की गई है। मौसम विभाग के अनुसार तापमान 34 से 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जो वहां के सामान्य मौसम से कहीं ज्यादा है।
यह केवल अस्थायी मौसम बदलाव नहीं, बल्कि तेजी से बदलते वैश्विक जलवायु संकट का संकेत है।
यूरोप बना सबसे तेज से गर्म महाद्वीप
अमेरिकी एजेंसी राष्ट्रीय महासागरीय और वायुमंडलीय प्रशासन यानी NOAA और यूरोपीय जलवायु रिपोर्ट्स के अनुसार 1990 के बाद से यूरोप दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। पिछले कुछ वर्षों में वहां हीटवेव की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं। पहले जहां यूरोप में 30 डिग्री तापमान असामान्य था, वहीं अब 40 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की आशंका सामान्य होती जा रही है। लंदन, पेरिस और बर्लिन जैसे शहर अब “ट्रॉपिकल नाइट्स” यानी बेहद गर्म रातों का सामना कर रहे हैं, जहां रात में भी तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं गिर रहा।
एशिया में गर्मी का कहर
एशिया भी इस संकट से ज्यादा पीछे नहीं है। भारत, पाकिस्तान और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में अप्रैल और मई के दौरान तापमान 45 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच चुका है।भारत में नौतपा के दौरान उत्तर भारत के कई राज्यों—राजस्थान, हरियाणा, पंजाब और उत्तर प्रदेश में भीषण लू चल रही है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार इस बार गर्मी सामान्य से ज्यादा जल्दी और ज्यादा तीव्र रूप में आई है। लगातार बढ़ता तापमान अब केवल दिन की समस्या नहीं रहा, बल्कि रात का तापमान भी तेजी से बढ़ रहा है, जिससे शरीर को राहत नहीं मिल पा रही।
क्यों बढ़ रही है इतनी गर्मी
जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार इस असामान्य गर्मी के पीछे कई बड़े कारण हैं। सबसे प्रमुख वजह ग्लोबल वार्मिंग और ग्रीनहाउस गैसों का तेजी से बढ़ना माना जा रहा है। कोयला, पेट्रोलियम और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के अत्यधिक इस्तेमाल से वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा लगातार बढ़ रही है।यह गैसें पृथ्वी की गर्मी को बाहर जाने से रोकती हैं, जिससे धरती का तापमान धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा जंगलों की कटाई, शहरीकरण और कंक्रीट के बढ़ते जंगल भी गर्मी को बढ़ा रहे हैं। बड़े शहरों में “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव देखने को मिल रहा है, जहां कंक्रीट और डामर गर्मी को सोखकर लंबे समय तक बनाए रखते हैं।
आर्कटिक बर्फ पिघलने से हीटवेव
रिसर्च में यह भी सामने आया है कि आर्कटिक क्षेत्र की बर्फ तेजी से पिघलने के कारण यूरोप और एशिया में एक साथ हीटवेव की घटनाएं बढ़ रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार आर्कटिक में बर्फ कम होने से वायुमंडलीय दबाव और हवाओं का पैटर्न बदल रहा है, जिससे लंबे समय तक गर्म हवा एक ही क्षेत्र में फंसी रहती है।इसी वजह से “हीट डोम” जैसी स्थिति बनती है, जहां गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती और तापमान तेजी से बढ़ता जाता है।
आधुनिक शहर गर्मी झेलने के लिए तैयार नहीं
दुनिया के अधिकांश बड़े शहर इतनी भीषण गर्मी के लिए तैयार नहीं हैं। यूरोप के कई देशों में घरों और सार्वजनिक भवनों में एयर कंडीशनिंग की व्यवस्था सीमित है, क्योंकि वहां पारंपरिक रूप से मौसम ठंडा रहता आया है।वहीं भारत जैसे देशों में लगातार बढ़ती आबादी, ट्रैफिक, प्रदूषण और सीमित हरियाली गर्मी को और ज्यादा खतरनाक बना रहे हैं।कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर, पानी की कमी और बिजली पर बढ़ता दबाव भी लोगों की मुश्किलें बढ़ा रहा है।
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
डॉक्टरों के अनुसार लगातार बढ़ती गर्मी हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, सांस संबंधी समस्याओं और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा रही है। बुजुर्ग, बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बाहर काम करने वाले मजदूर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तापमान इसी तरह बढ़ता रहा, तो आने वाले वर्षों में हीटवेव दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हो सकती है।
भविष्य को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी
जलवायु विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो भविष्य में ऐसी भीषण गर्मी और ज्यादा सामान्य हो जाएगी। आने वाले दशकों में यूरोप और एशिया के कई हिस्सों में लंबे समय तक चलने वाली हीटवेव आम हो सकती हैं। वैज्ञानिक लगातार सरकारों को कार्बन उत्सर्जन कम करने, हरित ऊर्जा अपनाने और शहरों को जलवायु अनुकूल बनाने की सलाह दे रहे हैं।दुनिया के कई हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, जंगलों में आग, सूखा और पानी का संकट यह संकेत दे रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की नहीं बल्कि वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में दुनिया के कई हिस्से इंसानों के लिए और ज्यादा कठिन होते जाएंगे।
