ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) को लेकर वैज्ञानिकों ने एक नई और महत्वपूर्ण जानकारी सामने रखी है। रिसर्च के अनुसार महिलाओं में मौजूद एक प्राकृतिक “सुरक्षा कवच” यानी नेचुरल सेफ्टी शील्ड कुछ खास जेनेटिक म्यूटेशन की वजह से कमजोर हो सकती है, जिससे महिलाओं और लड़कियों में ऑटिज्म का खतरा बढ़ सकता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह खोज ऑटिज्म की समझ, पहचान और भविष्य के इलाज के लिए बेहद अहम साबित हो सकती है।
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर क्या है
ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर एक न्यूरोडेवलपमेंटल स्थिति है, जो व्यक्ति के व्यवहार, संवाद क्षमता, सामाजिक समझ और सीखने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है। ऑटिज्म से पीड़ित बच्चों में बातचीत करने में कठिनाई, दोहराव वाला व्यवहार, सामाजिक दूरी और अलग तरह की प्रतिक्रियाएं देखने को मिल सकती हैं। यह समस्या बचपन में ही विकसित होने लगती है और हर व्यक्ति में इसके लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं।
महिलाओं में ऑटिज्म
अब तक वैज्ञानिक मानते रहे हैं कि पुरुषों में ऑटिज्म के मामले महिलाओं की तुलना में अधिक पाए जाते हैं। कई अध्ययनों के अनुसार लड़कों में ऑटिज्म का खतरा लड़कियों की तुलना में लगभग चार गुना अधिक होता है। इसके पीछे वैज्ञानिकों ने “फीमेल प्रोटेक्टिव इफेक्ट” यानी महिलाओं में मौजूद एक प्राकृतिक सुरक्षा प्रणाली को जिम्मेदार माना था, जो मस्तिष्क को कुछ हद तक न्यूरोडेवलपमेंटल विकारों से बचाने में मदद करती है। हालांकि नई रिसर्च में सामने आया है कि कुछ विशेष जेनेटिक म्यूटेशन इस सुरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि यदि महिलाओं में ऐसे आनुवंशिक बदलाव मौजूद हों, तो उनमें भी ऑटिज्म का खतरा तेजी से बढ़ सकता है।
रिसर्च में सामने आया
ऑटिज्म से जुड़े हजारों जेनेटिक डेटा का विश्लेषण किया। रिसर्च में पाया गया कि महिलाओं में ऑटिज्म विकसित होने के लिए पुरुषों की तुलना में अधिक गंभीर जेनेटिक म्यूटेशन की आवश्यकता होती है। लेकिन जब ये म्यूटेशन होते हैं, तो उनका असर ज्यादा गहरा हो सकता है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि कुछ जीन मस्तिष्क के विकास और न्यूरल कनेक्शन को प्रभावित करते हैं। इन जीनों में बदलाव होने पर महिलाओं की “नेचुरल सेफ्टी शील्ड” कमजोर हो जाती है और ऑटिज्म के लक्षण विकसित होने लगते हैं।
विशेषज्ञों ने कहना
न्यूरोलॉजिस्ट और जेनेटिक विशेषज्ञों का कहना है कि यह रिसर्च ऑटिज्म को समझने की दिशा में बड़ा कदम है। इससे यह समझने में मदद मिलेगी कि महिलाओं में ऑटिज्म की पहचान कई बार देर से क्यों होती है। विशेषज्ञों के अनुसार लड़कियां अक्सर अपने लक्षणों को सामाजिक व्यवहार के जरिए छिपा लेती हैं, जिससे निदान मुश्किल हो जाता है। डॉक्टरों का मानना है कि यदि शुरुआती उम्र में लक्षणों की पहचान हो जाए तो थेरेपी, व्यवहारिक प्रशिक्षण और विशेष शिक्षा के जरिए बच्चों को बेहतर सहायता दी जा सकती है।
जागरूकता की जरूरत
ऑटिज्म को लेकर समाज में अभी भी जागरूकता की कमी है। कई लोग इसे सामान्य व्यवहारिक समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। समय पर जांच और सही निदान न होने से बच्चों की सामाजिक और मानसिक विकास प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है। डॉक्टर माता-पिता को सलाह दे रहे हैं कि यदि बच्चे में बोलने में देरी, आंखों से संपर्क कम करना, बार-बार एक जैसा व्यवहार करना या सामाजिक गतिविधियों से दूरी जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत विशेषज्ञ से संपर्क करें।
भविष्य के इलाज
जेनेटिक म्यूटेशन और महिलाओं की सुरक्षा प्रणाली को लेकर हुई यह खोज भविष्य में ऑटिज्म के बेहतर इलाज और व्यक्तिगत थेरेपी विकसित करने में मदद कर सकती है। इससे महिलाओं और लड़कियों में ऑटिज्म की शुरुआती पहचान और अधिक सटीक तरीके से संभव हो पाएगी।
