देश में अवैध प्रवासियों के निर्वासन (Deportation) और नागरिकों के अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक बेहद संवेदनशील मामले की सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत को सूचित किया है कि वह बांग्लादेश निर्वासित किए गए कुछ लोगों को वापस भारत लाने के लिए तैयार हो गई है। भारत लौटने के बाद इन लोगों द्वारा किए जा रहे भारतीय नागरिकता के दावों की कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर गहन जांच की जाएगी।
सॉलीसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ (जिसमें न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली भी शामिल हैं) के समक्ष सरकार का पक्ष रखा। सरकार ने साफ किया कि यह निर्णय मामले के विशिष्ट तथ्यों और मानवीय परिस्थितियों को देखते हुए लिया गया है और इसे भविष्य के अन्य मामलों के लिए एक नजीर (अनुकरणीय मिसाल) नहीं माना जाना चाहिए।
8 से 10 दिनों में होगी वतन वापसी
सरकार की ओर से कोर्ट को आश्वस्त किया गया कि इन व्यक्तियों को वापस भारत लाने की प्रक्रिया में लगभग 8 से 10 दिन का समय लग सकता है।
सॉलीसिटर जनरल ने कहा: "सरकार उन्हें वापस लाएगी और उसके बाद उनकी नागरिकता और वैध स्थिति की बारीकी से जांच करेगी। जांच के परिणाम के आधार पर आगे के उचित कदम उठाए जाएंगे।"
उच्चतम न्यायालय ने सरकार के इस बयान को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की अगली सुनवाई की तारीख जुलाई 2026 तय की है।
क्या है पूरा मामला?
यह पूरा विवाद कलकत्ता उच्च न्यायालय के 26 सितंबर, 2025 के उस आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जिसमें हाई कोर्ट ने सुनाली खातून और अन्य को बांग्लादेश डिपोर्ट करने के केंद्र के फैसले को 'अवैध' करार देते हुए रद्द कर दिया था। केंद्र सरकार ने इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
इस मामले में मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
मानवीय आधार पर एंट्री: पिछले साल 3 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने 'मानवीय आधार' पर सुनाली खातून और उनके आठ वर्षीय बच्चे को भारत में पुनः प्रवेश की अनुमति दी थी।
अदालत के निर्देश: कोर्ट ने पश्चिम बंगाल सरकार को बच्चे की उचित देखभाल करने और बीरभूम जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को गर्भवती खातून को मुफ्त प्रसव (Delivery) सहित सभी जरूरी चिकित्सा सहायता देने का निर्देश दिया था।
विपक्ष का रुख: याचिकाकर्ताओं (खातून के पिता भोदु शेख) की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और संजय हेगड़े ने केंद्र सरकार के ढुलमुल रवैये पर आपत्ति जताई थी और कोर्ट में समय पर रुख साफ न करने को 'अनुचित' बताया था।
20 साल से दिल्ली में कर रहे थे मजदूरी
याचिकाकर्ता भोदु शेख के अनुसार, उनका परिवार पिछले दो दशकों (20 साल) से अधिक समय से दिल्ली के रोहिणी (सेक्टर 26) इलाके में दिहाड़ी मजदूर के रूप में रह रहा था।
18 जून को हिरासत: पिछले साल 18 जून को दिल्ली पुलिस ने उन्हें बांग्लादेशी होने के संदेह में हिरासत में लिया।
27 जून को निर्वासन: बिना उचित कानूनी प्रक्रिया के कथित तौर पर 27 जून को उन्हें सीमा पार (बांग्लादेश) धकेल दिया गया।
पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले की निवासी सुनाली खातून और स्वीटी बीबी के परिवारों को 'अवैध प्रवासी' मानकर बाहर किया गया था, जिसे कलकत्ता हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया था और केंद्र को एक महीने के भीतर इन्हें वापस लाने को कहा था।
बीरभूम के आमिर खान का भी ऐसा ही आरोप
निर्वासन (Deportation) का आधिकारिक प्रोटोकॉल क्या है?
अदालती कार्यवाही के दौरान केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा 2 मई, 2025 को जारी एक आधिकारिक ज्ञापन (Memorandum) का भी जिक्र आया। इस स्थापित प्रोटोकॉल के तहत:
स्थानीय जांच अनिवार्य: यदि किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में किसी विदेशी नागरिक के अनधिकृत रूप से रहने की आशंका है, तो संबंधित राज्य सरकार या यूटी प्रशासन पहले इसकी विस्तृत जांच करेगा।
प्रक्रिया की शुरुआत: जांच में अवैध प्रवास की पुष्टि होने के बाद ही विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) और नागरिक प्राधिकरणों के माध्यम से निर्वासन की प्रक्रिया नियमानुसार शुरू की जा सकती है।
इस मामले में इसी प्रोटोकॉल के उल्लंघन और भारतीय नागरिकों को गलती से डिपोर्ट किए जाने के आरोपों की जांच अब केंद्र सरकार वापस बुलाने के बाद करेगी।
