भारत और ग्रीस के बीच तेजी से बढ़ते रक्षा सहयोग ने तुर्की के रणनीतिक हलकों और मीडिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है। ग्रीक और तुर्की मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों में दावा किया गया है कि ग्रीस भारत द्वारा विकसित लंबी दूरी की क्रूज मिसाइल प्रणालियों और अन्य उन्नत रक्षा तकनीकों दिलचस्पी दिखा रही है अब तक किसी संभावित रक्षा सौदे की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन संभावना है की ने पूर्वी भूमध्यसागर क्षेत्र में सुरक्षा और शक्ति संतुलन को लेकर नई राजनिति दिख सकती है। यदि भारत और ग्रीस के बीच मिसाइल या अन्य रणनीतिक रक्षा प्रणालियों को लेकर सहयोग आगे बढ़ता है, तो इसका प्रभाव केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि तुर्की, यूरोपीय संघ और पूरे भूमध्यसागर क्षेत्र की सुरक्षा रणनीतियों पर भी पड़ सकता है।
भारत और ग्रीस का सम्बन्ध
गत वर्षों में भारत और ग्रीस के संबंधों में प्रसंसनीय प्रगति हुई है। दोनों देशों ने रक्षा,समुद्री सुरक्षा,साइबर सुरक्षा,ऊर्जा,व्यापार और रणनीतिक साझेदारी जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए कई उच्च स्तरीय बैठकें आयोजित की हैं। हिंद-प्रशांत और भूमध्यसागर क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों ने भारत और ग्रीस को एक-दूसरे के और करीब लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों, समुद्री सुरक्षा और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के समर्थक हैं पिछले एक वर्ष के दौरान दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों और रक्षा विशेषज्ञों के बीच बातचीत में बढ़ोतरी हुई है।
भारतीय मिसाइल
रिपोर्टों में भारत की मिसाइल लंबी दूरी से हमला करने वाली क्रूज मिसाइल पर बातचित हुई, रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी मिसाइलें हजारों किलोमीटर दूर स्थित अपने लक्ष्यों को सटीकता के साथ निशाना बनाने में सक्षम हैं और आधुनिक युद्ध में इन्हें महत्वपूर्ण रणनीतिक हथियार है। यदि उसे ऐसी क्षमता प्राप्त होती है तो एजियन सागर और पूर्वी भूमध्यसागर में उसकी प्रतिरोधक क्षमता काफी मजबूत हो सकती है। इससे ग्रीस को खतरों के खिलाफ बेहतर सुरक्षा कवच मिल सकता है। भारत ने कुछ वर्षों में मिसाइल तकनीक के क्षेत्र में प्रगति की है ब्रह्मोस, निर्भय और अन्य स्वदेशी परियोजनाओं ने भारतीय रक्षा उद्योग को वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाई है यही कारण है कि कई देश अब भारतीय रक्षा उत्पादों में रुचि दिखा रहे हैं।
तुर्की के चिंता का कारण
तुर्की और ग्रीस के बीच दशकों पुराना भू-राजनीतिक और सामरिक प्रतिस्पर्धा का इतिहास रहा है। दोनों देशों के बीच एजियन सागर की समुद्री सीमाओं, हवाई क्षेत्र, साइप्रस विवाद और ऊर्जा संसाधनों को लेकर कई बार तनाव की स्थिति बन चुकी है। तुर्की की मीडिया में प्रकाशित रिपोर्टों में कहा गया है कि यदि ग्रीस भारतीय लंबी दूरी की मिसाइल प्रणाली हासिल करता है, तो इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है। कुछ तुर्की विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ग्रीस की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा हो सकता है जिसके तहत वह अपने रक्षा ढांचे को आधुनिक बना रहा है।
भूमध्यसागर में सुरक्षा बदलाव
पूर्वी भूमध्यसागर आज दुनिया के सबसे संवेदनशील रणनीतिक क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां ऊर्जा संसाधनों, समुद्री व्यापार मार्गों और सैन्य प्रभाव को लेकर कई देशों के हित जुड़े हुए हैं। ग्रीस, तुर्की, फ्रांस, अमेरिका, इटली और यूरोपीय संघ के अन्य सदस्य देश इस क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं ऐसे में किसी भी नए रक्षा सहयोग या मिसाइल प्रणाली की तैनाती क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। आने वाले वर्षों में पूर्वी भूमध्यसागर में सैन्य आधुनिकीकरण और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है।
भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर
भारत पिछले कुछ वर्षों में रक्षा निर्यात को बढ़ाने में लगातार आगे बढ़ रहा है। केंद्र सरकार की आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा दिया जा रहा है रक्षा मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत का रक्षा निर्यात लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है। मिसाइल प्रणाली, रडार, नौसैनिक उपकरण और अन्य रक्षा उत्पादों को लेकर कई देशों ने भारत में रुचि दिखाई है। यदि भविष्य में ग्रीस और भारत के बीच किसी रक्षा समझौते पर सहमति बनती है, तो यह भारतीय रक्षा उद्योग के लिए एक बड़ी उपलब्धि होगी। इससे भारतीय तकनीक को यूरोपीय बाजार में और अधिक पहचान मिलने की संभावना बढ़ेगी तथा भारत की वैश्विक रक्षा निर्यातक के रूप में स्थिति मजबूत होगी।
ग्रीस की सरकार
फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत या ग्रीस की सरकार ने किसी मिसाइल खरीद समझौते की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। इसलिए वर्तमान में यह विषय मीडिया रिपोर्टों, रक्षा विश्लेषणों और संभावित रणनीतिक सहयोग की चर्चाओं तक ही सीमित है जिस तेजी से दोनों देशों के संबंध मजबूत हो रहे हैं, उसे देखते हुए भविष्य में रक्षा क्षेत्र में बड़े सहयोग की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
