1000 साल पुरानी साधु-परंपरा का अद्भूत केंद्र
कंकाली मठ महज एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि नागा साधुओं की सदियों पुरानी साधना पद्धति का गवाह रहा है। मठ के भीतर आज भी लगभग 1000 साल पुराने ऐतिहासिक अवशेष सुरक्षित रखे गए हैं। इनमें नागा साधुओं के उपयोग किए जाने वाले:
अस्त्र-शस्त्र: प्राचीन ढाल, कुल्हाड़ी, त्रिशूल और चिमटा
साधना सामग्री: मिट्टी व धातु के प्राचीन कमंडल और साधुओं के वस्त्र
दशहरे के दिन इन सभी अस्त्र-शस्त्रों और सामग्रियों की विशेष विधि-विधान से महापूजा की जाती है। माना जाता है कि दशहरे के दिन स्वयं माता कंकाली अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के साथ मठ में उपस्थित रहती हैं।
स्वप्न में आई थीं माता: जानिए कपाट खोलने के पीछे की कथा
कंकाली मठ और मंदिर का संचालन वर्तमान में महंत कृपाल गिरी महाराज की 12वीं पीढ़ी द्वारा किया जा रहा है। लोक कथाओं और उपलब्ध इतिहास के अनुसार, इस परंपरा के पीछे एक अनूठी कथा जुड़ी है:
पौराणिक मान्यता: एक समय महंत कृपाल गिरी महाराज को माता कंकाली ने स्वप्न में दर्शन दिए और पास के तालाब के किनारे मंदिर बनवाकर प्रतिमा स्थापित करने का आदेश दिया। महंत जी ने आदेश का पालन तो किया, लेकिन प्रतिमा मठ से मंदिर जाने के बाद वे अत्यंत दुखी और व्यथित रहने लगे।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर माता ने पुनः दर्शन दिए और सांत्वना देते हुए कहा कि वे हर वर्ष विजयादशमी के दिन अपने मूल स्थान (मठ) में लौटेंगी। इसी वचन के पालन स्वरूप हर साल दशहरे पर मठ के कपाट खोले जाते हैं।
श्मशान भूमि पर हुआ था निर्माण, तांत्रिक साधना से जुड़ी हैं जड़ें
इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों की मानें तो कंकाली मठ का निर्माण कभी श्मशान घाट की भूमि पर हुआ था। कालंतर में यह स्थान नागा साधुओं की कठिन तांत्रिक साधना का प्रमुख केंद्र बना। मठ और मंदिर परिसर के आसपास आज भी कई नागा साधुओं की समाधियां मौजूद हैं, जो इसके गूढ़ और रहस्यमयी इतिहास को बयां करती हैं।
650 साल पुराना कंकाली तालाब और नवरात्र का महत्व
मठ से सटा हुआ ऐतिहासिक कंकाली तालाब (पूर्व में कंकाली कुंड) लगभग 650 वर्ष पुराना माना जाता है। इस तालाब और मंदिर का निर्माण भी महंत कृपाल गिरी महाराज के संरक्षण में ही हुआ था। चैत्र और शारदीय नवरात्र के दौरान यहाँ अगाध श्रद्धा का माहौल रहता है। नवमी और दशमी तिथि पर श्रद्धालु दूर-दूर से यहाँ मनोकामनाएं लेकर पहुंचते हैं और तालाब में मनोकामना ज्योत व जवारा का विसर्जन किया जाता है। अपनी अटूट मान्यताओं और अनूठी परंपराओं के कारण कंकाली मठ आज भी छत्तीसगढ़ की आस्था का प्रमुख स्तंभ बना हुआ है।






