दक्षिण एशिया में अंतरिक्ष आधारित निगरानी (स्पेस सर्विलांस) को लेकर नई चिंताएं सामने आ रही हैं। रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान ने पिछले 16 महीनों में चीन की तकनीकी और प्रक्षेपण सहायता से छह अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट अंतरिक्ष में स्थापित किए हैं। रक्षा और रणनीतिक मामलों के इन सैटेलाइट्स का उद्देश्य केवल नागरिक उपयोग तक सीमित नहीं हो सकता, बल्कि इनका इस्तेमाल सीमा क्षेत्रों, सैन्य गतिविधियों और समुद्री क्षेत्रों की निगरानी के लिए भी किया जा सकता है। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत ने हाल के वर्षों में अंतरिक्ष और रक्षा क्षेत्र में अपनी क्षमताओं को लगातार मजबूत किया है। वहीं दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान के बीच बढ़ता रणनीतिक सहयोग भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकता है।
16 महीने में छह सैटेलाइट लॉन्च
रिपोर्ट्स के अनुसार जनवरी 2025 से जून 2026 के बीच पाकिस्तान ने छह पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट लॉन्च किए हैं। इनमें से अधिकांश सैटेलाइट सन-सिंक्रोनस ऑर्बिट में स्थापित किए गए हैं। यह ऐसी कक्षा होती है जहां से सैटेलाइट पृथ्वी के किसी विशेष क्षेत्र की नियमित अंतराल पर तस्वीरें ले सकते हैं। इन सैटेलाइट्स की मदद से पाकिस्तान को सीमावर्ती क्षेत्रों, सैन्य ठिकानों, सड़क नेटवर्क, हवाई अड्डों और समुद्री गतिविधियों से संबंधित नियमित जानकारी मिल सकती है। आधुनिक अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट्स मौसम, कृषि और आपदा प्रबंधन के साथ-साथ रणनीतिक निगरानी के लिए भी उपयोग किए जाते हैं।
भारत पर निगरानी
किसी भी देश के लिए पृथ्वी अवलोकन सैटेलाइट रखना सामान्य बात है। दुनिया के अधिकांश विकसित देशों के पास ऐसी क्षमता मौजूद है। हालांकि चिंता इस बात को लेकर है कि पाकिस्तान द्वारा हाल में स्थापित किए गए सैटेलाइट्स का नेटवर्क भारतीय उपमहाद्वीप को बार-बार कवर करने की क्षमता रखता है। यदि कई सैटेलाइट एक नेटवर्क के रूप में काम करें तो वे किसी क्षेत्र की अधिक बार तस्वीरें लेने में सक्षम होते हैं। इससे सीमावर्ती क्षेत्रों में निर्माण कार्य, सैन्य तैनाती, नौसैनिक गतिविधियां और बड़े बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं पर नजर रखना आसान हो जाता है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि इन सैटेलाइट्स का उपयोग केवल भारत की निगरानी के लिए ही किया जा रहा है। लेकिन भारत निश्चित रूप से उन देशों में शामिल है जिन पर इनकी नजर हो सकती है।
चीन की भूमिका
पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम में चीन लंबे समय से सहयोगी रहा है। कई पाकिस्तानी सैटेलाइट चीन के लॉन्च वाहनों के माध्यम से अंतरिक्ष में भेजे गए हैं। चीन न केवल प्रक्षेपण सेवाएं उपलब्ध कराता है बल्कि तकनीकी सहयोग और डेटा प्रोसेसिंग में भी मदद करता है। चीन और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग अब जमीन, समुद्र और वायु क्षेत्र से आगे बढ़कर अंतरिक्ष तक पहुंच चुका है। यही कारण है कि दोनों देशों के संयुक्त अंतरिक्ष कार्यक्रमों को रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद सक्रियता
भारत और पाकिस्तान के बीच हाल के तनावों के बाद निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने की गतिविधियां बढ़ी हैं। आधुनिक युद्ध और सुरक्षा रणनीतियों में सैटेलाइट्स की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो चुकी है। किसी भी सैन्य अभियान, सीमा प्रबंधन या समुद्री सुरक्षा व्यवस्था में रियल-टाइम जानकारी सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। ऐसे में अधिक संख्या में निगरानी सैटेलाइट्स किसी देश की खुफिया क्षमताओं को मजबूत कर सकते हैं।
भारतीय विशेषज्ञों की चिंता
भारतीय नौसेना के पूर्व फ्लैग ऑफिसर सुधीर पिल्लई ने इस घटनाक्रम को गंभीरता से लेने की जरूरत बताई है। उनका कहना है कि लगातार बढ़ती सैटेलाइट क्षमताओं को केवल संयोग नहीं माना जा सकता। उनके अनुसार अंतरिक्ष आधारित निगरानी आधुनिक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का अहम हिस्सा बन चुकी है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि पिछले कुछ समय में भारत के कुछ महत्वपूर्ण सैटेलाइट मिशनों को अपेक्षित सफलता नहीं मिली, जबकि दूसरी ओर क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी अपनी निगरानी क्षमता बढ़ाने में जुटे हुए हैं। ऐसे में भारत को भी अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है।
भारत की अंतरिक्ष क्षमता
भारत अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में दुनिया की अग्रणी शक्तियों में शामिल है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पास कई उच्च क्षमता वाले रिमोट सेंसिंग, संचार और सैन्य उपयोग वाले सैटेलाइट मौजूद हैं। भारत के पास सीमा निगरानी, समुद्री सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के लिए उन्नत सैटेलाइट नेटवर्क पहले से मौजूद है। इसके अलावा देश लगातार नई पीढ़ी के निगरानी और संचार सैटेलाइट विकसित कर रहा है।
भविष्य की रणनीतिक
आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष आधारित निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने की प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। चीन, अमेरिका, रूस, भारत और अन्य प्रमुख देश पहले से ही इस क्षेत्र में भारी निवेश कर रहे हैं। दक्षिण एशिया में भी अब अंतरिक्ष तकनीक केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं रह गई है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक संतुलन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
