संभाग के सरकारी अस्पतालों में नवजात बच्चों की जिंदगी को महफूज रखने के लिए भेजी गई ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) की ताजा खेप में एक बड़ी और चौंकाने वाली गड़बड़ी सामने आई है। बस्तर संभाग के कई जिलों में सप्लाई की गई वैक्सीन की कांच की शीशियां (वायल्स) अंदर से टूटी और चटकी हुई मिली हैं। जैसे ही यह मामला उजागर हुआ, पूरे स्वास्थ्य महकमे से लेकर राज्य मुख्यालय तक हड़कंप मच गया है। आनन-फानन में जांच और डैमेज कंट्रोल की कवायद शुरू कर दी गई है।
रायपुर से कड़े निर्देश
मामले की संवेदनशीलता और नवजातों की सुरक्षा को देखते हुए राज्य मुख्यालय रायपुर से बस्तर के स्वास्थ्य अफसरों को कड़े और स्पष्ट निर्देश जारी किए गए हैं।
बायो-मेडिकल वेस्ट गाइडलाइंस: आदेश में साफ कहा गया है कि जितनी भी वायल टूटी या चटकी हुई मिली हैं, उन्हें किसी भी हाल में बच्चों को न दिया जाए।
स्थानीय स्तर पर कार्रवाई: इन दूषित हो चुकी वायल्स को स्थानीय स्तर पर ही बायो-मेडिकल वेस्ट नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए तुरंत नष्ट करने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
जिलेवार नुकसान का लेखा-जोखा
बस्तर संभाग के अलग-अलग जिलों से जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, वे बेहद चिंताजनक हैं। अधिकारियों द्वारा की गई शुरुआती जांच में सामने आया नुकसान इस प्रकार है:
| जिला | कुल पहुंची खुराक (खेप) | टूटी हुई वायल्स की संख्या | स्थिति / एक्शन |
| जगदलपुर (बस्तर) | 40,000 खुराक | 7,000 वायल | सबसे ज्यादा नुकसान, नष्ट करने की प्रक्रिया जारी। |
| दंतेवाड़ा | 5,000 खुराक | 1,500 वायल | भारी मात्रा में खेप बर्बाद, लिखित शिकायत दर्ज। |
| सुकमा | - | 50 वायल | आंशिक नुकसान, स्थानीय स्तर पर नष्ट किया जा रहा है। |
| कुल नुकसान | - | 8,550+ वायल | लाखों रुपये के राजस्व का सीधा नुकसान। |
बजट पर सीधी चोट: सरकारी थोक खरीद में ओरल पोलियो वैक्सीन की एक वायल की कीमत लगभग ₹220 से ₹250 बैठती है। ऐसे में 8,550 से अधिक वायल्स के टूटने से सरकार को लाखों रुपये का सीधा वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा है।
क्यों टूटीं शीशियां?
विशेषज्ञों और मुख्य स्वास्थ्य अधिकारियों (CMHO) के अनुसार, कांच की शीशियां टूटने के पीछे कोई एक वजह नहीं है, बल्कि इसके पीछे तीन बड़े तकनीकी और व्यावहारिक कारण सामने आ रहे हैं:
1. फ्रीजिंग स्ट्रेस
पोलियो वैक्सीन को लंबे समय तक सुरक्षित और प्रभावी रखने के लिए डीप फ्रीजर का इस्तेमाल होता है। कोल्ड सेंटरों में लापरवाही या तकनीकी खराबी के कारण जब तापमान शून्य से बहुत नीचे (Minus) चला जाता है, तो शीशी के अंदर मौजूद तरल दवा जम जाती है। विज्ञान के नियम के अनुसार, जमने पर तरल का वॉल्यूम (आयतन) बढ़ जाता है। इसी अंदरूनी दबाव (Internal Pressure) के कारण कांच की वायल अंदर से चटक या ब्लास्ट हो जाती हैं।
2. ट्रांसपोर्टेशन शॉक
बस्तर के अंदरूनी इलाकों की सड़कें बेहद जर्जर और गड्ढों से भरी हैं। रायपुर स्टेट स्टोर से बस्तर लाते समय डिलीवरी वैन को लगातार भारी झटके लगे। यदि पैकेजिंग के दौरान थर्माकोल या बबल रैप की कोटिंग कमजोर रही होगी, तो इन झटकों के कारण कांच की शीशियां आपस में टकराईं और टूट गईं।
3. ग्लास क्वालिटी डिफेक्ट
एक आशंका यह भी जताई जा रही है कि मैन्युफैक्चरिंग के वक्त शीशियों के कांच की थिकनेस (मोटाई) एक समान नहीं थी। क्वालिटी कंट्रोल में कमी के कारण हल्का सा दबाव या झटका पड़ने पर भी ये शीशियां क्रैक हो गईं।
जानें... कहां बनती है यह वैक्सीन
भारत में ओरल पोलियो वैक्सीन (OPV) का मुख्य उत्पादन देश की शीर्ष नेशनल लैब्स में होता है:
भारत बायोटेक (हैदराबाद)
बिबकोल - BIBCOL (बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश)
सप्लाई चेन: इन हाई-टेक मैन्युफैक्चरिंग प्लांट से निकलने के बाद इस वैक्सीन को विशेष रेफ्रिजरेटेड वैन (Insulated Cold Chain Vehicles) के जरिए रायपुर स्थित स्टेट वैक्सीन स्टोर पहुंचाया जाता है। वहां से इसे जिलों और फिर संभागों के कोल्ड चेन सेंटरों में भेजा जाता है।
