संसद के मॉनसून सत्र की शुरुआत से ठीक पहले राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। मोदी सरकार के लिए दो बेहद महत्वपूर्ण और विवादास्पद विधेयकों (Bills) पर आम सहमति बनाना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। सोमवार को होने वाली एक और संसदीय समिति (JPC) की बैठक को अचानक टाल दिया गया है। यह समिति उच्च शिक्षा के मौजूदा रेगुलेटर्स को हटाकर एक सिंगल 'अम्ब्रेला बॉडी' (मुख्य संस्था) बनाने वाले प्रस्तावित कानून की समीक्षा कर रही है।
इससे ठीक पहले, पीएम-सीएम को पद से हटाने वाले एक अन्य संवेदनशील बिल पर भी जेपीसी (JPC) के सदस्यों के बीच तीखे मतभेद उभरकर सामने आए थे। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, बीजेपी सांसद दग्गुबाती पुरंदेश्वरी की अगुवाई वाली संसद की संयुक्त समिति, जो 'विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक' की बारीकी से जांच कर रही है, उसने अपनी बैठक फिलहाल स्थगित कर दी है। अगली बैठक कब होगी, इसकी तारीख अभी तय नहीं है।
सरकार बड़े विवाद से बचना चाह रही
अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि असली पेंच उच्च शिक्षा बिल से ज्यादा 'परिसीमन विधेयक' (Delimitation Bill) पर फंसा हुआ है। विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने के लिए ऐसा चक्रव्यूह तैयार किया है, जिससे पार पाना सत्ता पक्ष के लिए आसान नहीं दिख रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बैठकों को टालने का यह घटनाक्रम साफ इशारा करता है कि सरकार इस समय किसी भी बड़े विवाद या सीधे टकराव से बचना चाहती है।सरकार को विपक्षी दलों की साथ की जरूरत
लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ाने और निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन (परिसीमन) जैसे बड़े और दूरगामी राजनीतिक कदमों को आगे बढ़ाने के लिए सरकार को विपक्षी दलों के साथ की जरूरत है। यही वजह है कि सरकार पर्दे के पीछे से DMK और NCP (शरद पवार गुट) जैसी क्षेत्रीय और विपक्षी पार्टियों को साधने की कोशिश में जुटी है, क्योंकि गैर-एनडीए (Non-NDA) दल इन दोनों ही बिलों का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। दिलचस्प बात यह है कि उच्च शिक्षा रेगुलेशन बिल की जांच कर रही समिति के सदस्यों को उनकी अंतिम बैठक से महज कुछ दिन पहले ही ड्राफ्ट रिपोर्ट सौंपी गई थी।किसी भी बिल का संसद पटल पर आना मुश्किल
ऐसा ही कुछ बीजेपी सांसद अपराजिता सारंगी की अध्यक्षता वाली उस समिति में भी देखने को मिला था, जो पीएम-सीएम को हटाने वाले बिल को कानूनी रूप देने पर काम कर रही है। सारंगी की अध्यक्षता वाली समिति में तो हालात और भी नाटकीय हो गए। बैठक को अचानक बीच में ही रोकने से पहले, सदस्यों ने बहुमत के आधार पर अपनी पांच में से दो प्रमुख सिफारिशों को मंजूरी दे दी थी। लेकिन अब बदले हुए समीकरणों को देखकर लगता है कि इस मॉनसून सत्र में इन दोनों में से किसी भी बिल का संसद के पटल पर आना बेहद मुश्किल है।
बिल के लिए संविधान में संशोधन करने की जरूरत
इस पूरे घटनाक्रम पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार को आड़े हाथों लिया है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर मोर्चा खोलते हुए कहा: "संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने में महज दो दिन बचे हैं और ऐसे में दो बेहद विवादित विधेयकों पर बनी जेपीसी (JPC) ने अपनी रिपोर्ट को मंजूरी देने का काम टाल दिया है। इनमें से एक बिल के लिए तो संविधान में संशोधन करने की जरूरत है, जबकि दूसरा बिल साफ तौर पर संविधान के दायरे से बाहर जाकर काम करने का मामला है।"पक्ष और विपक्ष के बीच दंगल
रमेश ने आगे तंज कसते हुए कहा कि बीती 17 अप्रैल को लोकसभा में सरकार को जो राजनीतिक शर्मिंदगी झेलनी पड़ी थी, उसका डर अभी भी साफ दिख रहा है—भले ही गृह मंत्री मंचों से कितनी भी शेखी क्यों न बघार लें। यह रिपोर्ट बताती है कि आगामी मॉनसून सत्र केवल विधायी कामकाज का केंद्र नहीं होगा, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच एक बड़े सियासी दंगल का मैदान बनने जा रहा है।