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डिजिटल मोर्चे पर जंग : अब युद्ध सीमाओं पर ही नहीं, डेटा और एल्गोरिदम में भी लड़े जाएंगे, एआई और साइबर स्पेस से तय होगी अगली विश्व शक्ति
डिजिटल मोर्चे पर जंग : अब युद्ध सीमाओं पर ही नहीं, डेटा और एल्गोरिदम में भी लड़े जाएंगे, एआई और साइबर स्पेस से तय होगी अगली विश्व शक्ति
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डिजिटल मोर्चे पर जंग : अब युद्ध सीमाओं पर ही नहीं, डेटा और एल्गोरिदम में भी लड़े जाएंगे, एआई और साइबर स्पेस से तय होगी अगली विश्व शक्ति

कीर्तिमान से बातचीत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर सब्यसांची पाणीग्रही ने बताया कि साइबर वॉरफेयर और डिजिटल संप्रभुता अब नई वैश्विक ताकत बन चुके हैं। उन्होंने सचेत किया है कि टेक्नोलॉजी में आत्मनिर्भरता ही अब राष्ट्रीय सुरक्षा की असली ढाल होगी। अगर भारत को वैश्विक टेकनॉलाजी पावर बनना है, तो देश को सॉफ्टवेयर के साथ हार्डवेयर इकोसिस्टम में भी आत्मनिर्भर बनना होगा।

कीर्तिमान ब्यूरो
प्रकाशित: 07 Apr 2026, 06:52 PM · अपडेट: 18 Sep 2026, 03:31 AM
नई दिल्ली
AI द्वारा तैयार ~1 मिनट सारांश
दुनिया एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है, जहां अब युद्ध की परिभाषा ही बदल गई है। अब टैंक और मिसाइलें ही निर्णायक नहीं रहीं हैं। डेटा, एल्गोरिदम और नेटवर्क नई जंग के असली हथियार बनते जा रहे हैं। डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म कीर्तिमान से विशेष बातचीत में सॉफ्टवेयर इंजीनियर सब्यसांची पाणीग्रही ने बदलती वैश्विक सच्चाई का बेहद सटीक और चिंताजनक विश्लेषण किया है। पाणीग्रही के शब्दों में, आज टेक्नोलॉजी सिर्फ विकास का माध्यम नहीं, राष्ट्रीय शक्ति और सुरक्षा का मूल आधार बन चुकी है। वे कहते हैं कि तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में युद्ध का स्वरूप अब हथियारों और सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। यह डेटा, नेटवर्क और एल्गोरिदम की दुनिया में प्रवेश कर चुका है। 
उन्होंने बताया कि हर बड़े युद्ध के बाद टेक्नोलॉजी में क्रांतिकारी बदलाव आते हैं। आज के दौर में यह बदलाव विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सिक्योरिटी और डिफेंस टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में तेजी से दिखाई दे रहा है। युद्ध की परिस्थितियां देशों को मजबूर करती हैं कि वे अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करें और नई तकनीकों में निवेश बढ़ाएं। पाणीग्रही के अनुसार, युद्ध के दौरान जब डेटा सेंटर, नेटवर्क और बिजली जैसी आधारभूत संरचनाएं नष्ट होती हैं, तब पूरे डिजिटल सिस्टम की रीढ़ कमजोर पड़ जाती है। यही कारण है कि सभी देश अब तेजी से आत्मनिर्भर टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ रहे हैं, ताकि संकट के समय वे बाहरी निर्भरता से मुक्त रह सकें।
डिजिटल निर्भरता, सबसे बड़ा खतरा
बातचीत में उन्होंने एक अहम चिंता भी जताई कि दुनिया के कई देश आज भी तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर नहीं हुए हैं। वे प्रमुख रूप से अमेरिकी कंपनियों पर निर्भर हैं। उन्होंने बताया कि जब किसी देश का डेटा, कम्युनिकेशन और क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर विदेशी कंपनियों के हाथ में होता है, तो यह सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि सामरिक जोखिम भी बन जाता है। पाणीग्रही के अनुसार इस निर्भरता के कई खतरे जैसे किसी भी समय सर्विस बंद या प्रतिबंध का खतरा, नागरिकों के डेटा पर विदेशी नियंत्रण, देश की अर्थव्यवस्था से पूंजी का बाहर जाना, एल्गोरिदम और डिजिटल पॉलिसी पर नियंत्रण का अभाव हैं। 
आत्मनिर्भरता की मिसाल : पाणीग्रही ने China का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे उसने अपने सर्च इंजन, सोशल मीडिया और ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म विकसित कर एक मजबूत डिजिटल इकोसिस्टम तैयार किया। सरकारी समर्थन के साथ वहां क्लाउड और AI सेक्टर में तेज़ी से विकास हुआ, जिससे देश तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बन सका।
डिजिटल संप्रभुता क्यों जरूरी : उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर में डिजिटल संप्रभुता सिर्फ एक अवधारणा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी है। इसके प्रमुख उद्देश्य विदेशी प्लेटफॉर्म पर निर्भरता कम करना जैसे देश के भीतर स्टार्टअप और इनोवेशन को बढ़ावा देना, नागरिकों के डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करना, संकट या युद्ध के समय सिस्टम को चालू रखना, भारत को वैश्विक टेक पावर के रूप में स्थापित करना। 
भारत की दिशा : भारत में भी इस दिशा में कई महत्वपूर्ण प्रयास हो रहे हैं जैसे डिजिटल पहचान और पेमेंट सिस्टम, लोकल क्लाउड और डेटा इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण, सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस आदि। पाणीग्रही के मुताबिक अगर भारत को आने वाले दशक में टेक्नोलॉजी सुपरपावर बनना है, तो उसे हार्डवेयर से लेकर सॉफ्टवेयर तक पूरी वैल्यू चेन में आत्मनिर्भर होना होगा।
युद्ध का आर्थिक असर : उन्होंने यह भी बताया कि युद्ध का सीधा असर ग्लोबल सप्लाई चेन पर पड़ता है। सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स की कीमतों में बढ़ोतरी हो गई है। रेयर अर्थ मटेरियल की कमी, शिपिंग और लॉजिस्टिक्स में देरी और टेक्नोलॉजी एक्सपोर्ट पर प्रतिबंध बड़ा असर साबित हो रहा है। 

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